कोशिका विज्ञान (Cytology)
विज्ञान कि वह शाखा जिसमें कोशिका का अध्ययन किया जाता है। कोशिका विज्ञान कहलाती है।
Cell / Cyto / कोशिका
कोशिका सजीवों के शरीर की सबसे छोटी क्रियात्मक एवं संरचनात्मक इकाई है, इसकी खोज सबसे पहले मृत कोशिका के रूप में रॉबर्ट हुक ने सन 1665 ई. में कॉर्क के टुकड़े में कि थी, जो वास्तव में एक कोशिका भित्ति थी |
इसके बाद सन 1674 ई. में एण्टोनी वॉन ल्यूवेनहॉक ने तालाब के दूषित जल में जीवाणु के रूप में जीवित कोशिका को खोजा था इस लिए ल्यूवेनहॉक को जीवाणु विज्ञान का जनक माना जाता है और रॉबर्ट हुक को कोशिका विज्ञानं का जनक माना जाता है |
कोशिका के अध्ययन को साइटोलॉजी (Cytology) कहा जाता है |
जीवाणु के अध्ययन को बैक्टिरियोलोजी (Bacteriology) कहा जाता है |
वे जीव जिनका शरीर केवल एक कोशका का बना होता है एक कोशिकीय जीव (Unicellular organism) कहलाते है | जैसे - अमीबा, क्लेमाइडोमोनस तथा अनेक कोशिकाओं से बने जीव बहुकोशिकीय जीव (Multicellular organisms) कहलाते है |
एककोशिकीय जन्तु में सभी जैव क्रियाऐं जैसे - पोषण, श्वसन, उत्सर्जन, वृद्धि एवं जनन शरीर की एक कोशिका द्वारा ही की जाती है | परन्तु बहु कोशकीय जीवों में विभिन्न कार्यों के लिए विभिन्न कोशिकाओं के समूह पाए जाते है जिन्हे ऊत्तक कहा जाता है |
Cell Theory (कोशिका का सिद्धांत )
यह सिद्धांत सन 1838 - 39 में जंतु वैज्ञानिक थियोडोर श्वान व पादप वैज्ञानिक मैथियास श्लीडन ने प्रतिपादित किया था | जिसके अनुसार सरल जीवों (एक कोशिकीय) से लेकर उच्च श्रेणी के जटिल पादप एवं जंतु सभी का शरीर कोशिकाओं से मिलकर बना होता है | प्रत्येक कोशिकाओं का स्वतंत्र अस्तित्व होता है | और प्रत्येक जीव में कोशिकाऐं एक अभिन्न अंग के रूप में कार्य करती है |
यद्यपि श्वान व श्लाइडेन को कोशिका सिद्धांत के खोजकर्ता के रूप में पहचाना जाता है | फिर भी इस सिद्धांत की नींव कुछ पूर्व वैज्ञानिकों जैसे - रॉबर्ट हुक, ल्यूवेन्हॉक, ग्रीयू, वूल्फ इत्यादि ने रखी थी |
विर्चो ने 1855 में कोशिका के सिद्धांत में " Ominis Cellula e Cellula " वाक्य जोड़कर उसे आगे बढ़ाया जिसका इस सुझाव के अनुसार नयी कोशिकाओं का निर्माण पूर्ववर्ती कोशिकाओं के विभाजन से होता है | इससे कोशिका सिद्धांत को एक नया आधार मिला कि "वृद्धि और विकास के कारण कोशिकाओं से नव कोशिकाओं का निर्माण होता है | "
कोशिका सिद्धांत की विशेषताएँ -
- कोशिका, जीवों की एक संरचनात्मक इकाई है |
- कोशिका, जीवों में कार्यों की इकाई है |
- सभी कोशिकाएँ, पूर्ववर्ती कोशिकाओं के विभाजन से ही बनती है |
- सभी जीव, कोशिका और उसके उत्पादों से बने होते है |
- कोशिकाएँ ही जीव है |
- किसी भी जीव की क्रियाशीलता, प्रत्येक कोशिका का परिणाम है |
- कोशकाएँ अनुवांशिकता की इकाई है |
- बहु कोशिकीय जीवों में, प्रत्येक कोशिका का एकीकरण करने के साथ, स्वयं का अस्तित्व भी बनाए रखती है |
- कोशिका सिद्धांत का अपवाद:- नवीनतम खोजों के आधार पर कोशिका सिद्धांत पूर्णतः तर्क संगत प्रतीत नहीं होता है। क्योकि सभी जीव एक कोशिकीय नहीं होते है। जैसे - अकोशिकीय प्रोकैरियोट और अन्य कोशिकाऐं जिनमें केन्द्रक एवं कलाबद्ध कोशिकांग नही पाये जाते है। वायरस इसका सबसे बड़ा अपवाद है। इसे सजीव एवं निर्जीव के बीच की योजक कड़ी कहा जाता है।
- कोशिका के प्रकार - कोशिकायें समान्यतः दो प्रकार कि होती है -
1. प्रोकैरियोटिक कोशिका ( अकेन्द्रकीय ):- वे कोशिकाये जिनमें केन्द्रक नहीं पाया जाता है । उन्हें प्रोकैरियोटिक कोशिकायें कहते है जैसे- जीवाणु, अमीबा, नीले हरे शैवाल, माइकोप्लाज्मा आदि।
2. यूकैरियोटिक कोशिकायें ( सुकेन्द्रकीय):- वे कोशिकाये जिनमें केन्द्रक पाया जाता है । उन्हें यूकैरियोटिक कोशिकायें कहते है । जैसेः- सभी उच्च वर्गीय जन्तुओं कि कोशिकायें।
कोशिका का आकार
1.पृथ्वी पर पायी जाने वाली सबसे छोटी कोशिका - माइकोप्लाज्मा गैलीसैप्टिकम
PPLO ( PPLO = Pleuropneumonia-Like Organisms)
2. पृथ्वी पर पायी जाने वाली सबसे बड़ी कोशिका - शुतुरमुर्ग का अण्ड़ा (ostrich egg)
3. मानव में पायी जाने वाली सबसे छोटी कोशिका - नर में शुक्राणु व मादा में - RBC
4. मानव में पायी जाने वाली सबसे बड़ी कोशिका - नर में भक्षाणु व मादा में अण्डाणु
5. मानव में पायी जाने वाली सबसे लम्बी कोशिका - तंत्रिका कोशिका ( न्यूराॅन )
PPLO ( PPLO = Pleuropneumonia-Like Organisms)
2. पृथ्वी पर पायी जाने वाली सबसे बड़ी कोशिका - शुतुरमुर्ग का अण्ड़ा (ostrich egg)
3. मानव में पायी जाने वाली सबसे छोटी कोशिका - नर में शुक्राणु व मादा में - RBC
4. मानव में पायी जाने वाली सबसे बड़ी कोशिका - नर में भक्षाणु व मादा में अण्डाणु
5. मानव में पायी जाने वाली सबसे लम्बी कोशिका - तंत्रिका कोशिका ( न्यूराॅन )
कोशिका की संरचना
कोशिका कि संरचना को तीन भागों में बांटा गया है-
1. बाह्य आवरण 2. कोशिका द्रव्य 3. कोशिकांग
1. बाह्य आवरण:- कोशिका द्रव्य को चारों ओर से घेरे रहने वाले आवरण को कोशिका का बाह्य आवरण कहलाता है । इसे दो भागों में बांटा गया है।
कोशिका भित्ति(Cell Wall):- यह जन्तु कोशिका में नहीं पायी जाती है। यह पादप कोशिकाओं में सेल्युलोज की तथा कवक में काइटिन कि बनी होती है। यह कठोर एवं मृत आवरण होता है। जो कोशिका को यांत्रिक सहारा प्रदान करती है।
प्लाज्मोडेस्मेटा:- मध्य पटलिका तथा कोशिका भित्ति की पर्ते व अन्य कोशिकायें छोटे- छोटे छिद्रों द्वारा छिद्रित होती है। जिसके द्वारा कोशिका द्रव्य एक कोशिका से दूसरी कोशिका में जाता है। जिसे प्लाज्मोडेस्टा ( जीव द्रव्य तंतु ) कहते है।
कोशिका झिल्ली (Cell membren):- यह जन्तु एवं पादप दोनों कोशिकाओं में पायी जाती है। इसे नैगेली एवं क्रैमर ने 1855 में कोशिका कला नाम दिया । तथा प्लोव ने इसे प्लाज्मा कला नाम दिया । यह प्रोटीन एवं लिपिड़ कि बनी होती है। और यह चयनात्मक अर्द्धपारगम्य झिल्ली होती है। इसका सर्वमान्य तरल मौजेक माॅडल 1972 ई. सिंगर एवं निकाॅलसन ने दिया था।
एण्डोसाइटोसिस - पदार्थों को कोशिका झिल्ली से कोशिका के अन्दर ग्रहण करना एण्डोसाइटोसिस कहलाता है।
फेगोसाइटोसिस - ठोस पदार्थों को कोशिका झिल्ली के द्वारा कोशिका में ग्रहण करना ।
पिनोसाइटोसिस - तरल पदार्थों को कोशिका झिल्ली के द्वारा कोशिका में ग्रहण करना ।
2. कोशिका द्रव्य(Cytoplasm):- कोशिका झिल्ली एवं केन्द्रक झिल्ली के मध्य पाये जाने वाले द्रव्य को कोशिका द्रव्य कहते है।
केन्द्रक द्रव्य(Caryoplasm):- केन्द्रक के अन्दर पाये जाने वाले द्रव्य को केन्द्रक द्रव्य कहते है।
जीव द्रव्य(Protoplasm):- कोशिका द्रव्य एवं केन्द्र द्रव्य के मिश्रण को जीव द्रव्य कहते है। प्रोटोप्लाज्म
(Protoplasm / जीवद्रव्य)
की खोज सबसे पहले फैलिक्स डुजार्डिन (Felix Dujardin) ने 1835 में इसे 'सारकोड' (Sarcode) नाम दिया था। पुर्किन्जे तथा वाॅन माॅल ने कोशिका के समस्त जीवित भाग को सम्मिलित रूप से जीवद्रव्य नाम दिया ।
हैक्सले ने जीवद्रव्य को जीवन का भौतिक आधार कहा है।
3. कोशिकांग:- कोशिका में पायी जाने वाली क्रियात्मक इकाई को कोशिकांग कहते है। कोशिका में निम्नलिखित कोशिकांग पाये जाते है-
अन्तः प्रद्रव्यी जालिका:- खोजकर्ता - पोर्टर
कोशिका द्रव्य में पायी जाने वाली जालनुमा संरचना को अन्तः प्रद्रव्यी जालिका कहते है। इसे कोशिका का कंकाल कहते है। यह दो प्रकार का होता है-
(a) चिकनी अन्तः प्रद्रव्यी जालिका (Smooth Endo plasmic reticulum S.E.R.)
(b) खुर्दरी अन्तः प्रद्रव्यी जालिका ( Rough Endo plasmic Reticulum R.E.R ) :- इस पर राइबोसोम पाये जाते है। जो प्रोटीन का निर्माण करते है।
- गाॅल्जीकाय/गाॅल्जीउपकरण/गाॅल्जीबाॅड़ी -
खोजकर्ता-कैमिलो गाॅल्जी (1898)
यह सभी यूकैरियोटिक कोशिकाओं में पाया जाता है यह लाल रक्त कणिकाओं , पादपों की चालनी नलिकाओं और प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में नही पायी जाती है। पादप कोशिकाओं व अकोशिकीय प्राणियों के कोशिका द्रव्य में बिखरे पड़े रहते है। इनको डिक्टियोसोम कहते है। इनको कोशिका का ट्रेफिक पुलिस व यातायात प्रबंधक भी कहते है। यह शुक्राणु के एक्रोसोम का निर्माण करता है।
- लाइसोसोम:-
खोजकर्ता - डी ड्यूवे (1955)
लाइसोसोम शब्द का निर्माण दो लैटिन शब्दों से हुआ है। Lyso = नष्ट करना Soma = Body ( काय )। यह केवल जन्तु कोशिकाओं में पाया जाता है। इसमें पाचक रस पाये जाते है। जिन्हे हाइडोलाइटिक एंजाइम कहते है। जो पाचन का कार्य करते है। इसलिए लाइसोसोम अपशिष्ट पदार्थ एवं जीवाणुओं को नष्ट करता है। इसलिए इसे कोशिका का कचरा पात्र कहते है। जब कभी यह कोशिका में फट जाता है तो कोशिका के सभी अवयवो को पचा देता हैं इसलिए इसे आत्मघाती थैली कहते है। ये शुक्राणु के एक्रोसोम के आगे पाये जाते है। और निषेचन की क्रिया में भाग लेते है।
- माइटोकाॅण्ड्रिया ( सूत्रकणिका ):-
खोजकर्ता - कोलिकर
कोलिकर ने इसकी जन्तुओं की पेशीय कोशिकाओं में कि थी और सार्कोसोम नाम दिया था । आल्टमैन ने इसे पादप कोशिकाओं में खोजा और बायोप्लास्ट नाम दिया था और सी. बेण्डा ने इसे माइटोकाॅड्रिया नाम दिया।
यह एक दोहरी झिल्ली युक्त कोशिकांग है। जिसकी आंतरिक झिल्ली पर अंगुलिनुमा प्रवर्ध पाये जाते है। जिन्हे क्रिस्टी कहते है। इन क्रिस्टी पर कुछ कण पाये जाते है जिन्हे F1 कण कहते है। इन कणों में इलेक्ट्राॅन परिवहन तंत्र (E.T.S.) तथा ऑक्सीडेटिव फास्फोराइलेशन के लिए आवश्यक सभी एन्जाइम पाये जाते है।
माइटोकाॅण्ड्रिया में स्वयं का डी. एन. ए. पाया जाता है इसलिए इसे अर्द्धस्वायत शासी कोशिकांग कहते है।
वर्तमान में भी पेशीय कोशिकाओं में पाये जाने वाले माइटोकाॅण्ड्रिया को सार्कोसोम कहते है।
इसमे क्रैब्स चक्र एवं E.T.S. चक्र के दौरान ATP का निर्माण होता है । इसलिए इसे कोशिका का शक्ति गृह कहते है। यह कोशिका का ताप नियंत्रक बिंदु है।
- राइबोसोम:-
खोजकर्ता - क्लाड, नामकरणकर्ता - पैलेड
यह कोशिका का सबसे छोटा कोशिकांग है। यह झिल्ली रहित कोशिकांग है। यह कोशिका में प्रोटीन का निर्माण करता है इसलिए इसे प्रोटीन की फैक्ट्री तथा कोशिका का इंजन कहते है। यह दो प्रकार का होता है -
1. 70S ribosome:- यह प्रोकैरियोटिक एवं युकैरियोटिक कोशिकाओं में पाया जाता है। इसकी इकाई 50s + 30s है।
2. 80S ribosome :- यह केवल युकैरियोटिक कोशिकोओं में पाया जाता हैं। इसकी इकाई 60s + 40s है। S = स्वेदबर्ग इकाई
- लवक:- ( खोजकर्ता - हैकल) यह केवल पादप कोशिकाओं में पाया जाता है। यह एक दोहरी झिल्ली युक्त कोशिकांग है। यह तीन प्रकार का होता है -
1 अवर्णी लवक ( ल्युकोप्लास्ट ):- यह पादप के जड़ एवं तने में पाये जाते है। और भोजन के संग्रहण का कार्य करता है।
2 वर्णी लवक ( क्रोमोप्लास्ट ):- यह फूल तथा फल में पाया जाता है। जैसे:- कैरोटीन - लाल, नारंगी रंग का गाजर में , जैन्थोफिल - पीले रंग का फूलों में, लाइकोपिन - टमाटर में, कैप्सिथिन - लाल मिर्च में।
3 हरित लवक ( क्लोरोप्लास्ट ):-
यह दोहरी झिल्ली युक्त कोशिकांग है। यह कोशिका का सबसे बड़ा कोशिकांग हैं । इसमें भी स्वयं का डी. एन. ए. पाया जाता है इसलिए इसे भी अर्द्धस्वायतशासी कोशिकांग कहते है। इसमें हरे रंग का वर्णक पर्णहरित ( क्लोरोफिल ) पाया जाता है जो प्रकाश संश्लेषण का कार्य करता है । यह सौर ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तित करता है। अर्थात् यह भोजन का निर्माण करता है। इसलिए इसे कोशिका का रसोइया व हरित लवक को रसोई घर कहते है।
नोटः- तीनो लवक एक दूसरे में परिवर्तित हो जाते है।
- रिक्तिका ( रसधानी):- ( खोजकर्ता - डुर्जाडिन)
यह पादप कोशिकाओं में पाये जाने वाला एक बड़ा रिक्त एवं मृत भाग है। जो अपशिष्ट पदार्थों का संग्रहण करता हैं। इसका आवरण टोनोप्लास्ट कहलाता है। इामे पाये जाने वाले पदार्थ को कोशिका रस कहते है।
खाद्य धानी:- वह रिक्तिका जो खा़द्य पदार्थों का संग्रहण करती है। खाद्य धानी कहलाती है।
- तारक काय (Centrioles):- (खोजकर्ता - वाॅन बेण्डन)
यह समस्त जन्तु कोशिकाओं में केन्द्रक के निकट तारे के समान आकृति मे पाया जाता है। तारककाय का निर्माण केन्द्रिका से होता है। प्रत्येक तारककाय में दो तारककेन्द्र होते है तथा एक दूसरे के लम्बवत रहते है। इसका मुख्य कार्य कोशिका विभाजन के समय तर्कु तन्तुओं का निर्माण करना है। यह शुक्राणु की पूंछ का निर्माण करता है। तथा सूक्ष्म जीवों मे पाये जाने वाले गमन अंगो जैसे कशाभिका व पक्ष्माभ का आधार बिन्दु बनाता है।
- केन्द्रक :- (खोजकर्ता - राॅबर्ट ब्राउन)
यह कोशिका कि समस्त क्रियाओं को नियंत्रित करता है। इसलिए इसे कोशिका का मस्तिष्क, प्रबन्धक व नियंत्रक कहा जाता है। केन्द्रक दोहरी झिल्ली युक्त कोषिकांग है जिसकी बाह्य झिल्ली पर राइबोसोम पाये जाते है। केन्द्रक कि उपस्थिति के आधार पर कोशिका के दो प्रकार होते है 1. प्रोकैरियोटिक 2. युकैरियोटिक
केन्द्रक के अन्दर पाये जाने वाले सूक्ष्म धागेनुमा संरचना को क्रोमेटिन कहते है जो कोशिका विभाजन के समय केन्द्रक द्रव्य को अवशोषित कर लेती है। और एक स्पष्ट संरचना का निर्माण करती है जिसे क्रोमोसोम कहते है। मानव कि एक सामान्य कोशिका में क्रामोेसोम ( गुणसूत्र ) कि संख्या 46 या 23 जोड़ी होती है। गुणसूत्र कि खोज स्ट्राॅसबर्गर ने कि थी। तथा इसका नाम वाल्डेयर ने दिया था।
गुणसूत्र दो प्रकार के होते है -
1. अलिंग गुणसूत्र (Autosomes 44 or 22 pair )
2. लिंग गुणसूत्र (Sex chromosome 2 or 1 pair )
नर में 44 + XY व मादा में 44 + XX गुणसूत्र पाये जाते है।
जब युग्मकों का निर्माण होता है। तो अर्द्धसूत्री विभाजन होता है। जिससे कोषिका में इनकी संख्या आधी हो जाती है। इस प्रकार नर युग्मक (शुक्राणु ) में गुणसूत्रों कि संख्या 22 +X व 22 +Y होती है। तथा मादा युग्मक( अण्डाणु) में गुणसूत्रों की संख्या 22 +X व 22 +X होती है। मानव में लिंग निर्धारण की क्रिया निषेचन के समय होता है।
- कोशिका विभाजन
रुडोल्फ विरचाऊ (Rudolf Virchow - 1855): इन्होंने ने ही सबसे पहले यह प्रसिद्ध सिद्धांत दिया था कि "सभी कोशिकाएँ पहले से मौजूद कोशिकाओं के विभाजन से ही बनती हैं" (लैटिन भाषा में: Omnis cellula e cellula)। इससे पहले वैज्ञानिकों को स्पष्ट नहीं था कि नई कोशिकाएँ कहाँ से आती हैं।
वाल्थेर फ्लेमिंग (Walther Flemming - 1879 से 1882): जर्मन जीव वैज्ञानिक वाल्थेर फ्लेमिंग को समसूत्री विभाजन (Mitosis) की खोज का श्रेय दिया जाता है।
कोशिकाओं में तीन प्रकार का विभाजन होता है -
1. असूत्री विभाजन ( Amitosis ) :- इस प्रकार का विभाजन उन कोशिकाओं में होता हैं। जिनमें केन्द्रक नही पाया जाता है अर्थात् प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में होता है, इसमें विभाजन कि प्रमुख अवस्थायें प्रोफेज, मेटाफेज,एनाफेज व टीलोफेज नही पायी जाती है।
समसूत्री कोशिका विभाजन (Mitosis)
1. परिचय (Introduction)
समसूत्री विभाजन (Mitosis) वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक कायिक कोशिका (Somatic Cell) विभाजित होकर दो समान नई संतति कोशिकाओं (Daughter Cells) का निर्माण करती है। इसे 'समीकरण विभाजन' (Equational Division) भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें बनने वाली दोनों नई कोशिकाओं में गुणसूत्रों (Chromosomes) की संख्या जनक कोशिका के बिल्कुल समान होती है। सबसे पहले माइटोसिस शब्द का प्रयोग डब्ल्यु फ्लेमिंग ने किया था।
2. समसूत्री विभाजन की विशेषताएँ
- स्थान: यह विभाजन जीवों की कायिक कोशिकाओं (Somatic cells) में होता है।
- उद्देश्य: शरीर की वृद्धि, विकास, अंगों की मरम्मत (Repair), और पुरानी कोशिकाओं का प्रतिस्थापन करना।
- परिणाम: एक कोशिका से दो समान द्विगुणित ($2n$) कोशिकाएँ बनती हैं।
3. कोशिका चक्र (Cell Cycle) और विभाजन के चरण
समसूत्री विभाजन मुख्य रूप से दो चरणों में पूरा होता है:
A. अंतरावस्था (Interphase) - तैयारी का चरण
विभाजन से पहले कोशिका खुद को तैयार करती है। इसमें डीएनए का प्रतिकृतिकरण (DNA Replication) और प्रोटीन का संश्लेषण होता है।
B. कायिक विभाजन (M-Phase / Mitosis Proper)
यह मुख्य विभाजन चरण है, जो दो उप-चरणों में बंटा होता है:
- केन्द्रक विभाजन (Karyokinesis): केंद्रक का विभाजन, जो 4 अवस्थाओं में पूरा होता है।
- कोशिकाद्रव्य विभाजन (Cytokinesis): कोशिका के द्रव और बाहरी आवरण का विभाजन।
4. केन्द्रक विभाजन (Karyokinesis) की 4 अवस्थाएँ
1. प्रोफ़ेज (Prophase - पूर्वावस्था)
- यह विभाजन की प्रथम और सबसे लंबी अवस्था है।
- क्रोमैटिन धागे संघनित (Condense) होकर स्पष्ट गुणसूत्रों (Chromosomes) के रूप में दिखाई देने लगते हैं।
- केन्द्रिका (Nucleolus) और केंद्रक झिल्ली (Nuclear membrane) गायब होने लगती हैं।
- तारककाय (Centrosome) विपरीत ध्रुवों की ओर जाने लगते हैं और तर्कु तंतु (Spindle fibers) बनने लगते हैं।
2. मेटाफ़ेज (Metaphase - मध्यावस्था)
- इस अवस्था में गुणसूत्र कोशिका के मध्य भाग में आकर व्यवस्थित हो जाते हैं, जिसे मेटाफ़ेज प्लेट (Metaphase plate) कहते हैं।
- गुणसूत्रों की आकृति का अध्ययन करने के लिए यह सबसे अच्छी अवस्था है।
- तर्कु तंतु गुणसूत्रों के काइनेटोकोर (Kinetochore) से जुड़ जाते हैं।
3. एनाफ़ेज (Anaphase - पश्चवस्था)
- यह सबसे छोटी अवस्था है।
- सेंट्रोमियर (Centromere) के विभाजन से गुणसूत्रों के क्रोमैटिड्स अलग हो जाते हैं और विपरीत ध्रुवों की ओर खींचने लगते हैं।
- खिंचाव के कारण एनाफ़ेज अवस्था में गुणसूत्र V, L, J या I आकार के दिखाई देते हैं।
4. टेलोफ़ेज (Telophase - अंत्यावस्था)
- यह प्रोफ़ेज के ठीक विपरीत अवस्था है।
- गुणसूत्रों के चारों ओर पुनः केंद्रक झिल्ली बन जाती है और केन्द्रिका प्रकट हो जाती है।
- गुणसूत्र फिर से पतले क्रोमैटिन जाले में बदलने लगते हैं। इस प्रकार एक कोशिका में दो केंद्रक बन जाते हैं।
5. कोशिकाद्रव्य विभाजन (Cytokinesis)
केंद्रक विभाजन के तुरंत बाद कोशिका का द्रव्य भी दो भागों में बंट जाता है:
- जंतु कोशिकाओं में: कोशिका झिल्ली पर एक खाँच (Furrow) बनती है जो अंदर की ओर धंसकर कोशिका को दो भागों में बांट देती है।
- पादप कोशिकाओं में: पादप कोशिका में कठोर भित्ति होने के कारण बीच में सेल प्लेट (Cell plate) या कोशिका पट्टिका बनती है, जो बाहर की ओर बढ़कर दो कोशिकाएँ बनाती है।
6. समसूत्री विभाजन का महत्व
- आनुवंशिक स्थिरता: यह संतति कोशिकाओं में आनुवंशिक सामग्री (DNA) की समानता बनाए रखता है।
- वृद्धि और विकास: बहुकोशिकीय जीवों के शरीर का आकार इसी से बढ़ता है।
- हीलिंग/मरम्मत: शरीर में कहीं चोट लगने या पुरानी कोशिकाओं के नष्ट होने पर नई कोशिकाएँ इसी विभाजन से बनती हैं।
3. अर्द्धसूत्री विभाजन ( Meiosis ):- इस विभाजन को न्युनकारी विभाजन भी कहते है क्योंकि इसमें केन्द्रक का दो बार विभाजन और गुणसूत्रों का एक बार विभाजन होता है तथा गुणसूत्रों की संख्या आधी रह जाती है। इस प्रकार के विभाजन से युग्मकों ( शुक्राणु व अण्डाणु ) का निर्माण होता है।
अर्द्धसूत्री कोशिका विभाजन (Meiosis)
1. परिचय (Introduction)
अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) की खोज सबसे पहले जर्मन जीवविज्ञानी ऑस्कर हर्टविग (Oscar Hertwig) ने 1876 में समुद्री अर्चिन (Sea Urchin) के अंडों में की थी।
अर्द्धसूत्री विभाजन या मियोसिस नाम फार्मर और मुरे ने दिया था। अर्द्धसूत्री विभाजन (Meiosis) वह विशेष प्रकार का कोशिका विभाजन है जो लैंगिक जनन (Sexual Reproduction) करने वाले जीवों की जनन कोशिकाओं (Germ cells) में होता है। इस विभाजन के फलस्वरूप बनने वाली संतति कोशिकाओं (युग्मकों या Gametes जैसे शुक्राणु और अंडाणु) में गुणसूत्रों की संख्या जनक कोशिका की तुलना में आधी (Half / $n$) रह जाती है। इसलिए इसे न्यूनकारी विभाजन (Reductional Division) भी कहते हैं।
2. अर्द्धसूत्री विभाजन की मुख्य विशेषताएँ
- स्थान: यह जनन अंगों (जैसे वृषण और अंडाशय) में युग्मक निर्माण के समय होता है।
- उद्देश्य: संतति में गुणसूत्रों की संख्या को स्थिर रखना (ताकि पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुणसूत्रों की संख्या दोगुनी न हो) और जीवों में विविधता (Variations) उत्पन्न करना।
- परिणाम: एक द्विगुणित ($2n$) जनक कोशिका से चार अगुणित ($n$) भिन्न संतति कोशिकाएँ बनती हैं।
3. अर्द्धसूत्री विभाजन के चरण
यह विभाजन दो क्रमिक चरणों में पूरा होता है:
- अर्द्धसूत्री प्रथम (Meiosis I): यह वास्तविक न्यूनकारी विभाजन है, जिसमें गुणसूत्रों की संख्या आधी हो जाती है।
- अर्द्धसूत्री द्वितीय (Meiosis II): यह समसूत्री विभाजन के समान होता है, जिसमें क्रोमैटिड्स अलग होते हैं।
A. अर्द्धसूत्री प्रथम (Meiosis I)
यह सबसे जटिल और महत्वपूर्ण चरण है, जिसमें क्रॉसिंग ओवर (Crossing Over) होता है। इसके चार उप-चरण हैं:
1. प्रोफ़ेज I (Prophase I) - सबसे लंबी और महत्वपूर्ण अवस्था
इसे आगे पाँच उप-अवस्थाओं में बांटा गया है:
- लेप्टोटीन (Leptotene): गुणसूत्र पतले और लंबे धागे जैसे दिखने लगते हैं।
- जाइगोटीन (Zygotene): समजात गुणसूत्र (Homologous chromosomes) जोड़े बनाने लगते हैं, जिसे सिनैप्सिस (Synapsis) कहते हैं।
- पाइकीटीन (Pachytene): इस अवस्था में समजात गुणसूत्रों के बीच आनुवंशिक पदार्थों का आदान-प्रदान होता है, जिसे क्रॉसिंग ओवर (Crossing Over) कहते हैं। इसी कारण संतानों में माता-पिता से भिन्नता (Variations) आती है।
- डिप्लोटीन (Diplotene): जुड़े हुए गुणसूत्र अलग होने लगते हैं, लेकिन जहाँ क्रॉसिंग ओवर हुआ होता है, वहाँ 'X' जैसी संरचना बनती है जिसे कायस्माटा (Chiasmata) कहते हैं।
- डायकिसिस (Diakinesis): कायस्माटा समाप्त होने लगता है और केंद्रक झिल्ली गायब हो जाती है।
2. मेटाफ़ेज I (Metaphase I)
- समजात गुणसूत्रों के जोड़े कोशिका के मध्य में (मेटाफ़ेज प्लेट पर) जुड़वां रूप में व्यवस्थित हो जाते हैं।
3. एनाफ़ेज I (Anaphase I)
- तर्कु तंतुओं के खिंचाव के कारण पूरे समजात गुणसूत्र विपरीत ध्रुवों की ओर खींच जाते हैं (यहाँ सेंट्रोमियर विभाजित नहीं होता, बल्कि पूरे गुणसूत्र अलग होते हैं)। इसी चरण में गुणसूत्रों की संख्या आधी हो जाती है।
4. टेलोफ़ेज I (Telo phase I)
- दो नए केंद्रक बन जाते हैं और कोशिकाद्रव्य विभाजन (Cytokinesis) के बाद दो अगुणित ($n$) कोशिकाएँ बन जाती हैं।
B. अर्द्धसूत्री द्वितीय (Meiosis II)
यह ठीक समसूत्री विभाजन (Mitosis) की तरह होता है:
- प्रोफ़ेज II: दोनों नई कोशिकाओं में केंद्रक पुनः विभाजित होने की तैयारी करता है।
- मेटाफ़ेज II: गुणसूत्र मध्य रेखा पर व्यवस्थित होते हैं।
- एनाफ़ेज II: इस बार सेंट्रोमियर का विभाजन होता है और क्रोमैटिड्स अलग होकर विपरीत ध्रुवों पर जाते हैं।
- टेलोफ़ेज II और साइटोकिसिस: अंत में कोशिकाद्रव्य विभाजन से चार अगुणित ($n$) संतति कोशिकाएँ बन जाती हैं।
4. अर्द्धसूत्री विभाजन का महत्व
- गुणसूत्रों की स्थिरता: लैंगिक जनन में नर और मादा युग्मकों के संलयन के बावजूद प्रजाति में गुणसूत्रों की संख्या पीढ़ी-दर-पीढ़ी निश्चित बनी रहती है।
- आनुवंशिक विविधता (Genetic Variation): 'क्रॉसिंग ओवर' के कारण संतानों में माता-पिता के गुणों का नया संयोजन (Combination) बनता है, जो विकास (Evolution) का मुख्य आधार है।


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