पारिस्थितिकी तंत्र Ecosystem

इकोलॉजी (Ecology) 

पारिस्थितिकी विज्ञान (इकोलॉजी) :- जीव का वातावरण के साथ अंतर्सम्बन्धों का अध्ययन | 

'इकोलॉजी' (Ecology) शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1866 में जर्मन जीवविज्ञानी अर्न्स्ट हेकेल (Ernst Haeckel) ने किया था।

इकोलॉजी का दूसरा नाम - बायोनॉमिक्स 

इकोलॉजी  का जनक - रीटर एवं ओडम 

भारतीय इकोलॉजी  के जनक - रामदेव मिश्रा 


इकोलॉजी के प्रकार - 

(a) स्वपारिस्थितिकी (Autoecology) :- एक जीव / प्रजाति का वातावरण के साथ सम्बन्ध का अध्ययन | 

(b) संपारिस्थितिकी (synecology) :- पूरे जैविक समुदाय का वातावरण के साथ सम्बन्ध का अध्ययन | इसे Community ecology भी कहते है | 


संगठन स्तर - जीव (जाति) - समष्टि(population) - समुदाय(Community)  - पारितंत्र (ecosystem) - जीवोम - जैवमंडल |

 


पारिस्थितिकी तंत्र की संरचना 

(Structure of Ecosystem)

पारिस्थितिकी तंत्र किसी विशिष्ट क्षेत्र के जैविक (Biotic) और अजैविक (Abiotic) घटकों के बीच की अंतःक्रिया का एक कार्यात्मक नेटवर्क है। पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) शब्द सबसे पहले ए.जी. टांसले (A.G. Tansley, 1935) द्वारा दिया गया था ।  


सबसे छोटा पारितंत्र (ecosystem) - पानी की बूंद 

सबसे बड़ा पारितंत्र (ecosystem) - महासागर 

सबसे स्थाई पारितंत्र (ecosystem) - महासागर 


वे सभी घटक जिनसे पारितंत्र (ecosystem) का निर्माण होता है पारिस्थितिक घटक कहलाते है |


पारिस्थितिकी तंत्र के घटक 

(Components of Ecosystem)

पारिस्थितिकी तंत्र मुख्य रूप से दो घटकों से मिलकर बनता है:

(क) जैविक घटक (Biotic Components)

  1. उत्पादक (Producers / Autotrophs):

    • ये स्वपोषी होते हैं जो सौर ऊर्जा का उपयोग कर प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) द्वारा भोजन का निर्माण करते हैं।

    • उदाहरण: हरे पौधे, फाइटोप्लैंकटन (सूक्ष्म शैवाल), और कुछ जीवाणु।

  2. उपभोक्ता (Consumers / Heterotrophs):

    • ये अपने भोजन के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उत्पादकों पर निर्भर रहते हैं।

    • प्राथमिक उपभोक्ता: शाकाहारी जीव (जैसे- हिरण, गाय, कीट)।

    • द्वितीयक उपभोक्ता: मांसाहारी जीव जो शाकाहारी जीवों को खाते हैं (जैसे- मेंढक, लोमड़ी)।

    • तृतीयक/शीर्ष उपभोक्ता: उच्च मांसाहारी जीव जो अन्य मांसाहारी जीवों को खाते हैं (जैसे- शेर, बाघ, चील)।

  3. अपघटक (Decomposers / Saprotrophs):

    • ये सूक्ष्म जीव (जैसे- कवक/Fungi और बैक्टीरिया) मृत कार्बनिक पदार्थों (Plants & Animals) को सरल अकार्बनिक तत्वों में तोड़ते हैं, जिससे पोषक तत्व पुनः प्रकृति में लौट जाते हैं।

(ख) अजैविक घटक (Abiotic Components)

  • भौतिक कारक: तापमान, प्रकाश (Solar Radiation), आर्द्रता, वायुमंडलीय दाब, और वर्षा।

  • अकार्बनिक और रासायनिक पदार्थ: नाइट्रोजन, फास्फोरस, कार्बन डाइऑक्साइड, ऑक्सीजन, जल और विभिन्न खनिज लवण।

पारिस्थितिकी तंत्र में ऊर्जा प्रवाह 

(Energy Flow in Ecosystem)

पारिस्थितिकी तंत्र में ऊर्जा का प्रवाह एकदिशीय (Unidirectional) होता है। यह हमेशा सूर्य से शुरू होकर उत्पादकों, फिर उपभोक्ताओं और अंत में अपघटकों की ओर बढ़ता है तथा ऊष्मा के रूप में नष्ट हो जाता है।

  • ऊष्मागतिकी के नियम (Laws of Thermodynamics):

    1. प्रथम नियम: ऊर्जा को न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है, इसे केवल एक रूप से दूसरे रूप में बदला जा सकता है (सूर्य की प्रकाश ऊर्जा $\rightarrow$ रासायनिक ऊर्जा)।

    2. द्वितीय नियम: ऊर्जा का प्रत्येक रूपांतरण ऊर्जा के क्षय (हाथ/ऊष्मा) के साथ होता है। कोई भी रूपांतरण 100% कुशल नहीं होता है।

  • लेंडमान का 10% का नियम (Lindeman's 10% Rule):

    • एक पोषण स्तर से अगले पोषण स्तर पर केवल 10% ऊर्जा ही स्थानांतरित होती है, शेष 90% ऊर्जा श्वसन, चयापचय और ऊष्मा के रूप में नष्ट हो जाती है।

    • प्रभाव: इस नियम के कारण खाद्य श्रृंखला (Food Chain) में पोषण स्तर आमतौर पर 4 या 5 से अधिक लंबे नहीं होते हैं।


पारिस्थितिकी पिरामिड 

पारिस्थितिकी पिरामिड विभिन्न पोषण स्तरों (Trophic Levels) पर जीवों के बीच संबंधों का आलेखीय (Graphical) निरूपण है। इसमें उत्पादक (Producers) पिरामिड के आधार (Base) पर होते हैं, जबकि शीर्ष उपभोक्ता (Top Consumers) उसके शिखर (Apex) पर स्थित होते हैं।

इसकी अवधारणा सबसे पहले ब्रिटिश पारिस्थितिकी विद चार्ल्स एलटन (Charles Elton, 1927) ने दी थी, इसलिए इन्हें 'एल्टोनियन पिरामिड' (Eltonian Pyramids) भी कहा जाता है।

पारिस्थितिकी पिरामिड के प्रकार (Types of Ecological Pyramids)

पारिस्थितिकी पिरामिड मुख्य रूप से तीन प्रकार के होते हैं:

(क) संख्या का पिरामिड (Pyramid of Numbers)

इसमें प्रत्येक पोषण स्तर पर जीवों की कुल संख्या को दर्शाया जाता है।

  • सीधा पिरामिड (Upright): घास के मैदान या वन पारिस्थितिकी तंत्र में आधार पर उत्पादकों (घास/पेड़) की संख्या सबसे अधिक होती है और जैसे-जैसे हम ऊपर जाते हैं, जीवों की संख्या घटती जाती है।

  • उल्टा पिरामिड (Inverted): परजीवी खाद्य श्रृंखला (Parasitic Food Chain) में या वृक्ष पारिस्थितिकी तंत्र में यह उल्टा होता है (एक बड़े पेड़ पर अनगिनत पक्षी और उन पर अनगिनत परजीवी आश्रित होते हैं)।

(ख) जैवभार का पिरामिड (Pyramid of Biomass)

इसमें प्रत्येक पोषण स्तर पर मौजूद कुल जीवित जैविक द्रव्यमान (Biomass - शुष्क भार के रूप में) को मापा जाता है।

  • सीधा पिरामिड: स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्रों में (जैसे वन और घास के मैदान) उत्पादकों का जैवभार सबसे अधिक होता है और शीर्ष उपभोक्ताओं की ओर जाने पर यह घटता जाता है।

  • उल्टा पिरामिड: जलीय (Aquatic) पारिस्थितिकी तंत्र में यह हमेशा उल्टा होता है। महासागरों में फाइटोप्लैंकटन (सूक्ष्म शैवाल) का जैवभार बहुत कम होता है, लेकिन उन पर निर्भर रहने वाली मछलियों और उच्च जलीय जीवों का जैवभार क्रमिक रूप से अधिक होता जाता है।

(ग) ऊर्जा का पिरामिड (Pyramid of Energy)

इसमें विभिन्न पोषण स्तरों पर प्रति इकाई क्षेत्र और समय में उपलब्ध ऊर्जा की कुल मात्रा को दर्शाया जाता है।

  • सदैव सीधा (Always Upright): ऊर्जा का पिरामिड हमेशा सीधा बनता है क्योंकि ऊष्मागतिकी के दूसरे नियम के अनुसार, एक पोषण स्तर से दूसरे पर जाने पर ऊर्जा का लगातार क्षय (हाथ/ऊष्मा के रूप में) होता है (लेंडमान का 10% नियम)। इसमें नीचे से ऊपर जाने पर ऊर्जा की मात्रा घटती जाती है।

पारिस्थितिकी पिरामिड की सीमाएँ (Limitations)

  1. यह एक ही समय में कई पोषण स्तरों पर रहने वाले जीवों (जैसे सर्वभक्षी / Omnivores जैसे मनुष्य, पक्षी जो पौधे और मांस दोनों खाते हैं) की जटिल खाद्य श्रृंखला (Food Web) को ठीक से प्रदर्शित नहीं कर पाते।

  2. यह मौसमी परिवर्तनों या समय के साथ जीवों की आबादी में होने वाले उतार-चढ़ाव को शामिल नहीं करते।

  3. इसमें अपघटकों (Decomposers) के योगदान को उचित स्थान नहीं दिया जाता, जबकि वे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए अनिवार्य हैं।


जैव भू-रासायनिक चक्र 

(Biogeochemical Cycles)

पारिस्थितिकी तंत्र में पोषक तत्वों (Nutrients) का भंडार सीमित होता है, इसलिए इनका निरंतर चक्रीकरण आवश्यक होता है। 'जैव-भू-रासायनिक' शब्द का अर्थ है— जीव (Bio) + पृथ्वी की भूपर्पटी (Geo) + रासायनिक तत्व (Chemical)

इन चक्रों को दो मुख्य श्रेणियों में बांटा गया है:

(क) गैसीय चक्र (Gaseous Cycles)

  • इसमें वायुमंडल या जलमंडल मुख्य भंडार होता है।

  • कार्बन चक्र: प्रकाश संश्लेषण और श्वसन के माध्यम से कार्बन डाइऑक्साइड का संतुलन।

  • नाइट्रोजन चक्र: वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण (Nitrogen Fixation) बैक्टीरिया द्वारा नाइट्रेट्स में बदलना और फिर विनाइट्रीकरण (Denitrification) द्वारा वापस वायुमंडल में लौटना।

  • जल चक्र (Hydrological Cycle): वाष्पीकरण, संघनन और वर्षण की प्रक्रिया।

(ख) अवसादी चक्र (Sedimentary Cycles)

  • इसमें पृथ्वी की भूपर्पटी (Crust) या चट्टानें मुख्य भंडार होती हैं।

  • फास्फोरस चक्र: यह मुख्य रूप से चट्टानों के अपक्षय (Weathering) से शुरू होता है और जल तथा मृदा के माध्यम से जीवों तक पहुँचता है (इसमें वायुमंडलीय चरण नहीं होता)।

इकोलॉजिकल निके


'पारिस्थितिक आला' या 'इकोलॉजिकल निके' (Ecological Niche) किसी प्रजाति का पारिस्थितिकी तंत्र में उसकी कार्यप्रणाली, स्थिति और उसकी संपूर्ण जीवन शैली को दर्शाता है। सरल शब्दों में, यह किसी जीव का पारिस्थितिकी तंत्र में "पता" (Address) और उसका "पेशा" (Profession) दोनों है।

इसकी मुख्य विशेषताओं को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:

  • परिभाषा: किसी प्रजाति की वह विशेष भूमिका और स्थिति जिसके तहत वह पर्यावरण में जीवित रहती है, संसाधनों (भोजन, आवास आदि) का उपयोग करती है, और अन्य जीवों के साथ अंतःक्रिया (Interaction) करती है, उसका इकोलॉजिकल निके कहलाता है।

  • भोजन और पोषण: यह बताता है कि कोई जीव क्या खाता है, उसे भोजन के रूप में कौन खाता है, और वह ऊर्जा के प्रवाह में किस स्तर पर है (जैसे-उत्पादक, शाकाहारी, या मांसाहारी)।

  • पर्यावरणीय आवश्यकताएं: इसके अंतर्गत तापमान, आर्द्रता, पीएच (pH) और प्रकाश जैसी वे भौतिक और रासायनिक परिस्थितियां आती हैं जिनमें कोई जीव जीवित रह सकता है और अपनी प्रजाति को आगे बढ़ा सकता है।

  • प्रजातियों में अंतर: एक ही आवास (Habitat) में रहने वाली दो अलग-अलग प्रजातियों का 'निवास स्थान' एक जैसा हो सकता है, लेकिन उनका 'इकोलॉजिकल निके' कभी भी पूरी तरह समान नहीं होता है। यह प्रतिस्पर्धा (Competition) को कम करने में मदद करता है।

  • पारिस्थितिकी तंत्र में महत्व: यह अवधारणा वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद करती है कि कोई प्रजाति अपने पर्यावरण को कैसे प्रभावित करती है और पर्यावरण में होने वाले बदलाव उस प्रजाति को कैसे प्रभावित करते हैं।


इकोलॉजिकल निके के प्रकार


जीवाणु और जीवों के कार्य के आधार पर निके को मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा जाता है:

  • 1. स्थानिक या आवास निके (Spatial or Habitat Niche): यह उस भौतिक क्षेत्र या स्थान से संबंधित है जहाँ कोई जीव निवास करता है और अपनी दैनिक गतिविधियों को पूरा करता है (जैसे- पेड़ की छाल, तालाब की तली)।

  • 2. पोषण संबंधी निके (Trophic Niche): यह जीव के आहार और ऊर्जा के स्तर पर आधारित होता है। यह यह तय करता है कि जीव प्राथमिक उपभोक्ता है, द्वितीयक उपभोक्ता है या अपघटक (Decomposer) है।

  • 3. बहुआयामी या हाइपरवॉल्यूम निके (Multidimensional or Hutchinsonian Niche): इस आधुनिक अवधारणा के अनुसार, किसी जीव का निके केवल भोजन या स्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन सभी पर्यावरणीय कारकों (तापमान, आर्द्रता, pH, समय आदि) का कुल योग है जो उसकी उत्तरजीविता को प्रभावित करते हैं।

एक सरल उदाहरण -


मान लीजिए एक ही जंगल में बाघ और तेंदुआ दोनों रहते हैं:

  • आवास (Habitat): दोनों का निवास स्थान एक ही जंगल (एक ही भौगोलिक क्षेत्र) है।

  • इकोलॉजिकल निके (Ecological Niche): हालांकि दोनों मांसाहारी हैं, लेकिन उनके शिकार करने का तरीका और समय अलग होता है। तेंदुआ अक्सर पेड़ों पर चढ़कर शिकार करता है और रात में अधिक सक्रिय होता है, जबकि बाघ जमीन पर बड़े शिकार को प्राथमिकता देता है।

इकोटोन (Ecotone)


'इकोटोन' (Ecotone) दो या दो से अधिक अलग-अलग पारिस्थितिकी तंत्रों (Ecosystems) के मिलने की संक्रमणकालीन या संकीर्ण सीमा रेखा (Transition Zone) होता है। सरल शब्दों में, यह दो भिन्न Habitats (आवासों) के बीच का मिलन स्थल या 'संक्रमण क्षेत्र' है।

इसकी मुख्य विशेषताओं और उदाहरणों को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:

  • संक्रमण क्षेत्र (Transition Zone): यह वह क्षेत्र होता है जहाँ एक पारिस्थितिकी तंत्र धीरे-धीरे समाप्त होता है और दूसरा पारिस्थितिकी तंत्र शुरू होता है (जैसे- जंगल और घास के मैदान के मिलने की जगह)।

  • विशिष्ट विशेषताएं (Edge Effect): कोटोन में दोनों मिलने वाले पारिस्थितिकी तंत्रों के गुण पाए जाते हैं। इसके कारण यहाँ जैव विविधता (Biodiversity) और प्रजातियों का घनत्व अक्सर दोनों मूल पारिस्थितिकी तंत्रों की तुलना में अधिक होता है। इसे 'एज इफ़ेक्ट' (Edge Effect) कहा जाता है और यहाँ पाए जाने वाले जीवों को 'एज स्पीशीज' (Edge Species) कहते हैं।

  • लचीलापन: यह क्षेत्र पर्यावरण में होने वाले बदलावों के प्रति अधिक संवेदनशील और गतिशील होता है।

प्रमुख उदाहरण


  • मैंग्रोव वन (Mangrove Forests): यह समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र (Marine Ecosystem) और स्थलीय/नदी पारिस्थितिकी तंत्र (Terrestrial Ecosystem) के बीच का एक बेहतरीन इकोटोन है।

  • एश्चुअरी या मुहाना (Estuary): जहाँ मीठे पानी की नदी खारे पानी के समुद्र से मिलती है, वह क्षेत्र एक इकोटोन का काम करता है।

  • घास के मैदान और वन की सीमा (Grassland-Forest Boundary): जहाँ जंगल समाप्त होते हैं और घास का मैदान शुरू होता है, वह संक्रमण क्षेत्र इकोटोन कहलाता है।

जैव संचयन (Bioaccumulation) और जैव आवर्धन (Biomagnification) 


1. जैव संचयन (Bioaccumulation): मान लीजिए किसी तालाब के पानी में डीडीटी (DDT) या पारा (Mercury) जैसे विषैले पदार्थ घुले हैं। जब एक छोटी मछली उस पानी में सांस लेती है या भोजन खाती है, तो उसके शरीर में वह रसायन जमा होने लगता है। यदि वह रसायन उस मछली के शरीर से पेशाब या मल के जरिए बाहर नहीं निकल पाता, तो समय के साथ उसके शरीर में उसकी मात्रा बढ़ती जाती है—इसे ही जैव संचयन कहते हैं।

2. जैव आवर्धन (Biomagnification): 
अब उसी तालाब में, एक बड़ी मछली कई सारी छोटी मछलियों को खाती है, जिनके शरीर में पहले से ही पारा (Mercury) संचित है। चूँकि बड़ी मछली बहुत सारी छोटी मछलियों को खाती है, इसलिए उन सभी के शरीर का जहर अब उस एक बड़ी मछली में आ जाता है। इसके बाद, यदि कोई बाज (शीर्ष शिकारी) उन बड़ी मछलियों को खाता है, तो जहर की मात्रा बाज के शरीर में पहुँचकर सबसे अधिक हो जाती है। खाद्य श्रृंखला में इस तरह ऊपर की ओर जाने पर जहर की मात्रा के कई गुना बढ़ने को जैव आवर्धन कहते हैं।


मुख्य अंतर तालिका


विशेषताजैव संचयन (Bioaccumulation)जैव आवर्धन (Biomagnification)
किसे प्रभावित करता है?यह एक अकेले जीव के स्तर पर होता है।यह पूरे खाद्य जाल (Food Web) या कई पोषण स्तरों को प्रभावित करता है।
प्रक्रिया / मार्गजीव अपने पर्यावरण (पानी, हवा या भोजन) से सीधे अपने शरीर में रसायन अवशोषित करता है।रसायन एक जीव से दूसरे जीव में खाद्य श्रृंखला (Food Chain) के माध्यम से आगे बढ़ता है।
सांद्रता में बदलावसमय के साथ एक ही जीव के शरीर में रसायन की मात्रा बढ़ती जाती है।खाद्य श्रृंखला में ऊपर की ओर बढ़ने पर (शाकाहारी $\rightarrow$ मांसाहारी $\rightarrow$ शीर्ष शिकारी) रसायन की सांद्रता हर स्तर पर बढ़ती (आवर्धित होती) जाती है।
मुख्य कारणजीव का प्रदूषित वातावरण में रहना और रसायन का शरीर से बाहर न निकल पाना।उच्च पोषण स्तर के जीवों द्वारा अपने निचले स्तर के कई जीवों को भोजन के रूप में खाना।

पारिस्थितिकी (Ecology) में जीवों के बीच होने वाली अंतःक्रियाओं (Population Interactions) के ये प्रमुख प्रकार हैं। इन्हें संक्षेप में इस प्रकार समझा जा सकता है:

  • (a) सहभोजिता (Commensalism): यह वह संबंध है जिसमें एक जीव को लाभ होता है, लेकिन दूसरे जीव को न तो कोई लाभ होता है और न ही कोई हानि (0, +)।

    • उदाहरण: आम की पेड़ की शाखा पर उगने वाला आर्किड (Orchid) पौधा। आर्किड को रहने के लिए जगह मिल जाती है, लेकिन आम के पेड़ को इससे कोई फायदा या नुकसान नहीं होता।

  • (b) सहोपकारिता (Mutualism): यह एक ऐसा परस्पर संबंध है जिसमें दोनों जीवों को एक-दूसरे से लाभ होता है (+, +)। इसके बिना दोनों का जीवित रहना या विकास करना कठिन हो सकता है।

    • उदाहरण: लाइकेन (Lichen), जो शैवाल (Algae) और कवक (Fungi) का सहजीवी संबंध है, या परागण करने वाले कीट और फूल।

  • (c) परजीविता (Parasitism): यह ऐसा संबंध है जिसमें एक जीव (परजीवी/Parasite) को लाभ होता है और वह भोजन व आश्रय के लिए दूसरे जीव पर निर्भर रहता है, जबकि दूसरे जीव (पोषी/Host) को हानि पहुंचती है (+, -)।

    • उदाहरण: मनुष्य के शरीर में रहने वाले कृमि (Worms) या अमरबेल (Cuscuta) का पौधा।

  • (d) अंतर्जातीय परभक्षण (Interspecific Predation): जब दो अलग-अलग प्रजातियों के बीच एक जीव (परभक्षी/Predator) दूसरी प्रजाति के जीव (शिकार/Prey) को मारकर खा जाता है, तो इसे अंतर्जातीय परभक्षण कहते हैं (+, -)। इसमें परभक्षी को सीधा लाभ (ऊर्जा और भोजन) मिलता है और शिकार की मृत्यु हो जाती है।

    • उदाहरण: शेर द्वारा हिरण का शिकार करना।

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