BIOTECHNOLOGY

 BIOTECHNOLOGY

  • शाब्दिक अर्थ: यह 'बायोलॉजी' (Biology) और 'टेक्नोलॉजी' (Technology) शब्दों से मिलकर बना है।

  • जनक: कार्ल इरेकी (Karl Ereky) को वर्ष 1919 में 'बायोटेक्नोलॉजी' शब्द देने का श्रेय दिया जाता है।

  • प्रमुख सिद्धांत: इसके तहत जेनेटिक इंजीनियरिंग (आनुवंशिक इंजीनियरिंग), रीकॉम्बिनेंट डीएनए (rDNA) तकनीक, जीन थेरेपी और सेल कल्चर जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाता है।

जैव प्रौद्योगिकी के प्रमुख क्षेत्र (रंगों के आधार पर वर्गीकरण)

जैव प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोगों को मुख्य रूप से चार श्रेणियों में बांटा गया है:

  1. चिकित्सा जैव प्रौद्योगिकी (Red Biotechnology): इसका संबंध स्वास्थ्य और चिकित्सा से है। इसके जरिए इंसुलिन, एंटीबायोटिक्स, टीके (Vaccines) और जीन थेरेपी जैसी तकनीकें विकसित की जाती हैं।

  2. कृषि जैव प्रौद्योगिकी (Green Biotechnology): यह कृषि क्षेत्र से जुड़ी है। इसमें कीट-प्रतिरोधी, सूखा-सहनीय और अधिक उपज देने वाली आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) फसलें, जैव उर्वरक तथा जैव कीटनाशक तैयार किए जाते हैं।

  3. औद्योगिक जैव प्रौद्योगिकी (White Biotechnology): इसका उपयोग औद्योगिक प्रक्रियाओं, जैसे कि पर्यावरण के अनुकूल रसायनों के निर्माण, जैव ईंधन (Biofuels) और किण्वन (Fermentation) आधारित उत्पादों के लिए होता है।

  4. समुद्री जैव प्रौद्योगिकी (Blue Biotechnology): इसमें जलीय और समुद्री जीवों का उपयोग करके मूल्यवान उत्पाद और जैव ईंधन तैयार किए जाते हैं।

प्रमुख लाभ

  • स्वास्थ्य सुधार: गंभीर और आनुवंशिक बीमारियों के शुरुआती निदान और उपचार में मदद।

  • खाद्य सुरक्षा: जलवायु परिवर्तन और सीमित संसाधनों के बीच उच्च गुणवत्ता वाली फसलों की पैदावार बढ़ाना।

  • पर्यावरण संरक्षण: अपशिष्ट प्रबंधन, बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक का विकास और प्रदूषण नियंत्रण।



जैव प्रौद्योगिकी के घटक 

जीन स्तर पर काम करने के लिए कुछ विशेष घटकों की आवश्यकता होती है :-

  • एंजाइम ( Enzymes): डीएनए के विशेष खण्डों को काटने और जोड़ने के लिए विशेष एंजाइम की आवश्यकता होती है |

  • वेक्टर या वाहक (Vectors): बाहरी जीन को होस्ट कोशिका तक पहुँचाने का काम करते हैं।


[I] प्लाज्मिड :- 
  • यह एक छोटा, गोलाकार, डबल-स्ट्रैंडेड एक्स्ट्राक्रोमोसोमल है डीएनए अणु जो कोशिका के क्रोमोसोमल डीएनए से शारीरिक रूप से भिन्न होता है और स्वतंत्र रूप से दोहरा सकता है। 
  • यह डीएनए का एक टुकड़ा है जो क्रोमोसोमल डीएनए के समान नहीं है। यद्यपि, वे आमतौर पर बैक्टीरिया में पाए जाते हैं, लेकिन वे बहुकोशिकीय जीवों में भी मौजूद होते हैं।
  • प्रकृति में, Plasmid मेजबान को विभिन्न कार्यात्मक लाभ देते हैं जैसे कि एंटीबायोटिक प्रतिरोध (एएमआर), अवक्रमण क्षमता, रोगजनकता आदि।


प्लाज्मिड की खोज किसने की ? | Who discovered Plasmid?

  • इसकी खोज अमेरिकी आणविक जीवविज्ञानी जोशुआ लेडरबर्ग ने की थी।
  • 1952 में, उन्होंने “किसी भी एक्स्ट्राक्रोमोसोमल वंशानुगत निर्धारक” का उल्लेख करने के लिए ‘प्लाज्मिड‘ शब्द गढ़ा, जिसका अर्थ है कि कोई भी जीवाणु आनुवंशिक सामग्री जो अपने प्रतिकृति चक्र के कम से कम भाग के लिए एक्स्ट्राक्रोमोसोमली मौजूद है।
  • जोशुआ लेडरबर्ग को 1958 में फिजियोलॉजी या मेडिसिन में नोबेल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।
प्लाज्मिड के तत्व
क्र.सं.तत्व का नामविवरण
1प्रतिकृति की उत्पत्ति (ओआरआई)यह एक डीएनए अनुक्रम है जो प्रतिकृति मशीनरी प्रोटीन की भर्ती करके इसके अंदर प्रतिकृति की शुरुआत को उत्तेजित करता है। 
2एंटीबायोटिक प्रतिरोध जीनयह जीन प्लास्मिड युक्त बैक्टीरिया के चयन की अनुमति देता है।
3एकाधिक क्लोनिंग साइट (MCS)यह डीएनए का एक छोटा खंड है जिसमें कई सीमित प्रतिबंध स्थल हैं जो डीएनए को सम्मिलित करना आसान बनाते हैं। एमसीएस अक्सर अभिव्यक्ति इसमें प्रमोटर के डाउनस्ट्रीम में स्थित होता है।
4अंत:पत्रआगे के अध्ययन के लिए जीन, प्रमोटर, या अन्य डीएनए खंड को एमसीएस में क्लोन किया गया।
5प्रचारक क्षेत्रयह लक्ष्य जीन के प्रतिलेखन को संचालित करता है। अभिव्यक्ति वैक्टर के लिए एक महत्वपूर्ण घटक: यह यह भी निर्धारित करता है कि जीन किस प्रकार के सेल में व्यक्त किया गया है और पुनः संयोजक प्रोटीन की मात्रा प्राप्त की गई है।
6चयन करने योग्य मार्करएंटीबायोटिक प्रतिरोध के लिए जीन जीवाणु चयन को सक्षम बनाता है। कई Plasmids, इस बीच, चुनिंदा मार्कर भी ले जाते हैं जिनका उपयोग विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं में किया जा सकता है।
7प्राइमर बाइंडिंग साइटएक संक्षिप्त एकल-फंसे डीएनए अनुक्रम जिसका उपयोग पीसीआर प्रवर्धन के अनुक्रमण के लिए शुरुआती बिंदु के रूप में किया जाता है। प्लास्मिड अनुक्रम सत्यापन के लिए, प्राइमरों का उपयोग किया जा सकता है।


[II] बैक्टीरियोफेज (Bacteriophage)  :-

बैक्टीरियोफेज ऐसे विषाणु होते हैं जो जीवाणु में संक्रमण कर देते हैं। फेज में डी० एन० ए० अणु रेखाकार होता है अतः जब डी० एन० ए० को काटा जाता है, तो इसके दो टुकड़े हो जाते हैं। लेम्बडा (lambda) फेज व M13 फेज कुछ सामान्य फेज हैं। फेजों में केवल 20-25 kbp लम्बे डी० एन० ए० का ही वहन किया जा सकता है।


[III] कॉस्मिड वेक्टर (Cosmid vector) :-

कॉस्मिड्स संकर वेक्टर होते हैं जिनका निर्माण लेम्बडा (1) फेज के गुणसूत्र तथा प्लाज्मिड के डी० एन० ए० को मिलाकर किया जाता है। कॉस्मिड वेक्टर बनाने के लिए फेज का कॉस (cos) स्थल प्लाज्मिड में प्रविष्ट किया जाता है। कॉस स्थल को प्रविष्ट कराने से कॉस्मिड लगभग 40 kbp लम्बे डी० एन० ए० को प्रविष्ट कराने के लिए उसका वहन कर सकता है।

[IV] फेजमिड्स (Phagemids) :- 

ऐसे वेक्टर जो फेज तथा प्लाज्मिड को मिलाकर बनाए जाते हैं उन्हें फेजमिड्स कहते हैं। सबसे अधिक सामान्य रूप से प्रयोग किया जाने वाला फेजमिड् वेक्टर pBluescrip II KS है। यह 2961 kbp लम्बे डी० एन० ए० का वाहन कर सकता है।

[V] शटल वेक्टर (Shuttle vectors)

शटल वेक्टर भी संकर वेक्टर होते हैं जिन्हें प्लाज्मिड तथा SV40 विषाणु से मिलाकर बनाया जाता है। शटल वेक्टर में चिन्ह लगाने वाला (marker) होता है जो दोनों ही तन्त्रों में व्यक्त होता है तथा डी० एन० ए० प्रवेश (DNA insert) को एशरिशिया कोलाई (E. coli) तथा किसी अन्य पोषद जैसे ईस्ट कोशिका के मध्य आगे-पीछे खिसकाने में प्रयोग किया जाता है।

[IV] कृत्रिम गुणसूत्र वाहक के रूप में (Artificial chromosome as vector):

इनको शटल वाहक भी कहते है।

(1) BAC (जीवाणु कृत्रिम गुणसूत्र ) : यह कृत्रिम रूप से Ori-gene की सहायता से संश्लेषित किया जाता है।

(ii) YAC तथा MAC [यीस्ट कृत्रिम गुणसूत्र तया स्तनधारी कृत्रिम गुणसूत्र]

ये कृत्रिम रूप से Ori-gene, centromere DNA तथा telomere DNA द्वारा संश्लेषित किये जाते है।

शटल सामान्यतः 100 2000 Kb लम्बाई के DNA का स्थानान्तरण करते है।

कुछ पादप विषाणु जैसे CMV [फुलगोभी मोजेक विषाणु] तथा जैमिनीविषाणु भी वाहक के रूप में उपयोगी होते हैं।

मक्का के ट्रान्सपोजोन तथा ड्रोसोफिला के P- तत्व भी वाहक के रूप में उपयोग किये जाते है।



एंजाइम 

जैव प्रोद्योगिकी में कई एंजाइम उपयोग में आते है जिनमें से कुछ एंजाइम निचे दिए गए है - 

रेस्ट्रिक्शन एंजाइम


रिस्ट्रिक्शन एंजाइम (Restriction Enzyme), जिन्हें प्रतिबंध एंडोन्यूक्लियेस भी कहा जाता है, जैव प्रौद्योगिकी (Biotechnology) और आनुवंशिक इंजीनियरिंग (Genetic Engineering) के सबसे महत्वपूर्ण उपकरण हैं। इन्हें आनुवंशिकी की दुनिया में " आणविक कैंची" (Molecular Scissors) कहा जाता है।

1. खोज (Discovery)

  • रिस्ट्रिक्शन एंजाइमों की खोज 1960 के दशक के शुरुआती वर्षों में हुई थी।

  • वैज्ञानिक वेर्नर आर्बर (Werner Arber), हैमिल्टन स्मिथ (Hamilton O. Smith), और डैनियल नाथंस (Daniel Nathans) ने जीवाणुओं (Bacteria) पर अध्ययन के दौरान इनका पता लगाया था।

  • उन्होंने देखा कि जीवाणु कुछ ऐसे विशेष एंजाइम पैदा करते हैं जो उन पर आक्रमण करने वाले वायरस (बैक्टीरियोफेज) के डीएनए को नष्ट कर देते हैं।

  • इस महत्वपूर्ण खोज के लिए इन तीनों वैज्ञानिकों को 1978 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।


रिस्ट्रिक्शन एंजाइम (Restriction Enzyme) दो प्रकार का होता है -
(a) रिस्ट्रिक्शन एक्सोन्यूक्लियेज - यह डीएनए को सिरों पर से काटता है | 
(b) रिस्ट्रिक्शन एंडोन्यूक्लियेज - यह डीएनए को मध्य में विशेष स्थल पर काटता है | 

रिस्ट्रिक्शन एंडोन्यूक्लियेज के प्रकार (Types)

Hind II (हिंड II) दुनिया का सबसे पहला खोजा गया प्रतिबंध एंडोन्यूक्लियेस (Restriction Endonuclease) एंजाइम है। जैव प्रौद्योगिकी और आनुवंशिक इंजीनियरिंग के इतिहास में इसका बहुत बड़ा महत्व है।

  • खोज और पृथक्करण: इसे सबसे पहले 1968 में जीवाणु (Haemophilus influenzae) से अलग किया गया था। इसका नामकरण भी इसी जीवाणु के नाम पर किया गया है (यहाँ 'Hin' जीवाणु की प्रजाति से और 'd' स्ट्रेन से तथा 'II' इसकी पहचान का क्रम दर्शाता है)।

  • कार्य करने का तरीका: Hind II डीएनए अणु को बिल्कुल एक विशिष्ट बिंदु पर काटता है। यह डीएनए के क्षारों (Base Pairs) के 6-बेस पेयर के एक निश्चित क्रम (Recognition Sequence) को पहचानता है।

रिस्ट्रिक्शन एंजाइम के कार्य (Functions)

  • विदेशी डीएनए को नष्ट करना: प्राकृतिक रूप से जीवाणुओं के भीतर ये एंजाइम डिफेंस सिस्टम का काम करते हैं और किसी भी बाहरी या हानिकारक वायरस के डीएनए को खंडित करके निष्क्रिय कर देते हैं।

  • विशिष्ट अनुक्रमों की पहचान: रिस्ट्रिक्शन एंजाइम डीएनए के 4 से 8 बेस पेयर (Base Pairs) के एक विशिष्ट क्रम (जैसे EcoRI द्वारा 'GAATTC' अनुक्रम) को पहचानते हैं।

  • डीएनए को काटना: यह एंजाइम डीएनए के दोनों रज्जुकों (Strands) को शर्करा-फॉस्फेट बैकবোন पर एक खास जगह से काटता है। काटने के बाद ये या तो चिपचिपे सिरे (Sticky Ends) बनाते हैं या कुंद सिरे (Blunt Ends) बनाते हैं।

  • पुन:संयोजन डीएनए प्रौद्योगिकी (Recombinant DNA Technology): इनका उपयोग मनपसंद जीन को किसी जीव के डीएनए से अलग करने और उसे प्लाज्मीड या वाहक (Vector) के साथ जोड़ने के लिए किया जाता है।


डी० एन० ए० लाइगेज (DNA ligases)


डी० एन० ए० खण्डों (DNA fragments) को जोड़ने में डी० एन० ए० लाइगेज एन्जाइमों की आवश्यकता होती है। डी० एन० ए० लाइगेज डी० एन० ए० के एकल रज्जु कटावों (single strand nicks) को बन्द कर देता है जिनके 5'3' OH छोर होते हैं। ये फास्फोडाईएस्टर बन्ध (phosphodiester bond) पुनः बनाकर इस कार्य को सम्पन्न करते हैं। आनुवंशिक अभियांत्रिकी में सामान्यतः ई० कोलाई (E. coli) के डी० एन० ए० लाइगेज तथा T4 फेज द्वारा कोडित डी० एन० ए० लाइगेज उपयोग किये जाते हैं।


 विपरीत ट्रान्सक्रिप्टेज (Reverse transcriptase)


विपरीत ट्रान्सक्रिप्टेज एन्जाइम cDNA के संश्लेषण में बहुत उपयोगी होता है तथा cDNA के क्लोन बैंक की बनावट में भी उपयोगी है। एन्जाइम विपरीत ट्रान्सक्रिप्टेज की आवश्यकता पूरक डी० एन० ए० (DNA complementary) से संदेशवाहक आर० एन० ए० (mRNA) बनाने में होती है जिसे प्रति डी० एन० ए० (copy or complementary DNA) कहते हैं। cDNA के संश्लेषण में mRNA का उपयोग एक फर्मे (template) के रूप में किया जाता है।

डी० एन० ए० पॉलीमेरेज (DNA polymerases)


डी० एन० ए० संश्लेषण करने वाले एन्जाइम्स जैसे कि डी० एन० ए० पॉलीमेरेज की आवश्यकता मौजूद डी० एन० ए० के पूरक डी० एन० ए० (complementary DNA) बनाने में होती है। सामान्यतः आनुवंशिक अभियांत्रिकी में डी० एन० ए० का संश्लेषण cDNA के फर्मे (template) पर किया जाता है।

जीन अभियांत्रिकी (Genetic Engineering / आनुवंशिक इंजीनियरिंग)

1. परिभाषा (Definition)

जीन अभियांत्रिकी (Genetic Engineering) जीव विज्ञान और जैव प्रौद्योगिकी की वह शाखा है जिसके अंतर्गत किसी जीव के जीनोम (DNA) में कृत्रिम रूप से फेरबदल किया जाता है। इसमें किसी जीव के डीएनए से अवांछित जीन को हटाना, नए या मनपसंद (वांछित) जीन को जोड़ना, या मौजूदा जीन के क्रम को बदलना शामिल है ताकि जीव में नए और उपयोगी गुण विकसित किए जा सकें। इसे पुनर्योगज डीएनए प्रौद्योगिकी (rDNA Technology) भी कहा जाता है।

2. जनक (Father of Genetic Engineering)

  • पॉल बर्ग (Paul Berg) को जीन अभियांत्रिकी का जनक (Father of Genetic Engineering) माना जाता है।

  • उन्होंने 1972 में पहला इन विट्रो (In vitro) रिकांबिनेंट डीएनए अणु तैयार किया था। इस उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें 1980 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

  • (नोट: हर्बर्ट बोयर और स्टेनली कोहेन ने 1973 में पहली बार जीवित जीव में जीन को सफलतापूर्वक स्थानांतरित करके इस तकनीक को व्यावहारिक रूप दिया था।)

3. लाभ (Benefits / Advantages)

जीन अभियांत्रिकी के चिकित्सा, कृषि और उद्योग के क्षेत्र में अनेक महत्वपूर्ण लाभ हैं:

  • चिकित्सा और स्वास्थ्य (Medical Field):

    • इंसुलिन का उत्पादन: मधुमेह (Diabetes) के रोगियों के लिए बैक्टीरिया के माध्यम से कृत्रिम रूप से मानव इंसुलिन (Humulin) का बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जाता है।

    • जीन थेरेपी (Gene Therapy): आनुवंशिक विकारों (Genetic Disorders) को ठीक करने के लिए दोषपूर्ण जीनों को स्वस्थ जीनों से बदला जा सकता है।

    • टीके (Vaccines): हेपेटाइटिस बी जैसे संक्रमणों के लिए सुरक्षित और प्रभावी टीकों का निर्माण संभव हुआ है।

  • कृषि क्षेत्र (Agriculture):

    • कीट-रोधी फसलें: बीटी कॉटन (Bt Cotton) जैसी फसलें तैयार की जाती हैं जो खुद कीटों और सूंडियों से अपनी रक्षा कर सकती हैं।

    • पोषणयुक्त फसलें: गोल्डन राइस जैसे चावल विकसित किए गए हैं जिनमें विटामिन 'ए' प्रचुर मात्रा में होता है।

    • जलवायु सहनशीलता: सूखे, अत्यधिक ठंड या खारे पानी में भी जीवित रहने वाली फसलें उगाई जा सकती हैं।

  • औद्योगिक और पर्यावरण उपयोग (Industrial & Environmental):

    • पर्यावरण को साफ करने के लिए बैक्टीरिया (जैसे 'ऑयल जैटर') का विकास किया गया है जो तेल के रिसाव (Oil Spills) को खाकर खत्म कर देते हैं।

    • विभिन्न उपयोगी एंजाइमों, हार्मोन्स और जैव-ईंधन (Biofuels) का उत्पादन आसान हुआ है।


Recombinant DNA Technology


rDNA तकनीक (Recombinant DNA Technology / रिकॉम्बिनेंट डीएनए प्रौद्योगिकी) आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी (Biotechnology) और आनुवंशिक इंजीनियरिंग (Genetic Engineering) की एक बेहद महत्वपूर्ण तकनीक है। इसे आम भाषा में जीन क्लोनिंग या आनुवंशिक फेरबदल भी कहा जाता है।

आइए इस तकनीक को विस्तार से समझते हैं:

1. rDNA तकनीक क्या है?  


  • परिभाषा:    जब दो अलग-अलग स्रोतों (या विभिन्न जीवों) से प्राप्त डीएनए के टुकड़ों को प्रयोगशाला में आपस में जोड़ा जाता है, तो बनने वाले नए डीएनए को पुनर्योगज डीएनए (Recombinant DNA या rDNA) कहा जाता है।

  • इस प्रक्रिया के जरिए वैज्ञानिकों को किसी भी जीव के जीनोम में मनपसंद बदलाव करने, नए गुण पैदा करने या किसी विशिष्ट जीन की अनगिनत प्रतियां (Copies) तैयार करने की शक्ति मिलती है।

2. मुख्य चरण (Steps in rDNA Technology)


rDNA तकनीक मुख्य रूप से निम्नलिखित चरणों में पूरी होती है:

  1. वांछित डीएनए (Gene of Interest) का अलगाव: सबसे पहले जिस जीन का उपयोग करना है (जैसे इंसुलिन बनाने वाला जीन), उसे उसके मूल जीव के डीएनए से अलग किया जाता है।

  2. प्रतिबंध एंजाइमों (Restriction Enzymes) द्वारा काटना: '  आणविक कैंची' यानी रेस्ट्रिक्शन एंडोन्यूक्लियेस एंजाइम का उपयोग करके वांछित डीएनए और वाहक (Vector/प्लास्मिड) को एक विशिष्ट स्थल पर काटा जाता है।

  3. डीएनए खंडों का जुड़ना (Ligation):   कटे हुए वांछित जीन को DNA लाइगेज एंजाइम की मदद से वाहक (जैसे प्लास्मिड डीएनए) के साथ जोड़ दिया जाता है। इससे अब 'रिकांबिनेंट डीएनए' तैयार हो जाता है।

  4. मेजबान (Host) में प्रवेश कराना:    इस नए रिकांबिनेंट डीएनए को किसी परपोषी जीव (जैसे बैक्टीरिया या यीस्ट) के अंदर प्रवेश कराया जाता है।

  5. मेजबान का गुणन और अभिव्यक्ति (Cloning & Expression): जब बैक्टीरिया विभाजित होता है, तो उसके साथ-साथ rDNA की भी कई प्रतियां (Copies) बन जाती हैं। इसके बाद वह होस्ट कोशिका वांछित प्रोटीन या उत्पाद (जैसे इंसुलिन) का उत्पादन करने लगती है।

3. मुख्य उपकरण (Key Tools)


इस तकनीक को पूरा करने के लिए तीन मुख्य चीजों की आवश्यकता होती है:

  • एंजाइम:    जैसे रेस्ट्रिक्शन एंजाइम (काटने के लिए) और डीएनए लाइगेज (जोड़ने के लिए)।

  • वेक्टर (वाहक /Vectors): जैसे प्लास्मिड (Plasmids) और बैक्टीरियोफेज, जो बाहरी जीन को होस्ट तक पहुँचाते हैं।

  • मेज़बान जीव (Host Organism): जैसे E. coli बैक्टीरिया, जिसमें डीएनए को डालकर उसकी वृद्धि कराई जाती है।

4. प्रमुख अनुप्रयोग (Applications)


  • चिकित्सा के क्षेत्र में:    मानव इंसुलिन (Humulin), टीके (Vaccines) और हार्मोन का बड़े पैमाने पर उत्पादन।

  • जीन थेरेपी (Gene Therapy):    आनुवंशिक बीमारियों को ठीक करने के लिए दोषपूर्ण जीनों को स्वस्थ जीनों से बदलना।

  • कृषि में:    कीट-प्रतिरोधी फसलें (जैसे Bt कॉटन) तैयार करना।

  • औद्योगिक उपयोग: विभिन्न प्रकार के एंजाइमों और बायो-इंधन का उत्पादन।


पीसीआर 

(PCR - Polymerase Chain Reaction)


1. पीसीआर क्या है ?


  • परिभाषा: पीसीआर (पॉलीमरेज़ चेन रिएक्शन) एक क्रांतिकारी प्रयोगशाला तकनीक है, जिसका उपयोग डीएनए (DNA) के किसी छोटे टुकड़े की लाखों से करोड़ों प्रतियां (Copies) कुछ ही घंटों में तैयार करने के लिए किया जाता है।

  • इसे आनुवंशिक फोटोकॉपी मशीन भी कहा जाता है, क्योंकि यह बहुत कम मात्रा में उपलब्ध डीएनए के नमूने को आवर्धित (Amplify) करके उसकी अनगिनत ज़ेरॉक्स कॉपियां बना देती है।

  • इसकी खोज कैरी मुलिस (Kary Mullis) ने 1983 में की थी, जिसके लिए उन्हें 1993 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

2. पीसीआर के मुख्य चरण (Steps of PCR)


पीसीआर का एक चक्र मुख्य रूप से तीन चरणों में पूरा होता है, और यह चक्र बार-बार (लगभग 30 से 40 बार) दोहराया जाता है:

  1. विकृतीकरण (Denaturation - लगभग 94°C-95°C):

    • उच्च तापमान पर डीएनए के दोनों रज्जुकी (Strands) एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं और सिंगल-स्ट्रैंडेड डीएनए बनाते हैं।

  2. एनिलिंग (Annealing - लगभग 50°C-65°C):

    • तापमान थोड़ा कम किया जाता है ताकि छोटे डीएनए खंड (जिन्हें प्राइमर / Primers कहा जाता है) एकल-रज्जुक डीएनए के सही स्थान पर आकर जुड़ जाएं।

  3. विस्तार या एक्सटेंशन (Extension - लगभग 72°C):

    • इस चरण में टैक पॉलीमरेज़ (Taq Polymerase) नामक विशेष एंजाइम का उपयोग किया जाता है। यह एंजाइम प्राइमर का उपयोग करके न्यूक्लियोटाइड्स को जोड़ता है और डीएनए के नए रज्जुकों का निर्माण करता है, जिससे डीएनए की दो से चार प्रतियां बन जाती हैं।

3. मुख्य आवश्यकताएं (Key Requirements for PCR)


  • टैप पॉलीमरेज़ एंजाइम (Taq Polymerase): यह एक ताप-सहनीय एंजाइम है जो Thermus aquaticus नामक जीवाणु से प्राप्त होता है। यह उच्च तापमान पर भी नष्ट नहीं होता।

  • प्राइमर (Primers): छोटे न्यूक्लियोटाइड अनुक्रम जो डीएनए संश्लेषण की शुरुआत करते हैं।

  • डीऑक्सीन्यूक्लियोटाइड्स (dNTPs): नए डीएनए स्ट्रैंड्स को बनाने के लिए कच्चा माल (A, T, G, C)।

  • लक्ष्य डीएनए (Target DNA): वह डीएनए जिसकी प्रतियां बनानी हैं।

4. पीसीआर के प्रमुख उपयोग (Applications of PCR)


  • फोरेसिक साइंस (Forensic Science): अपराध स्थल से मिले बाल, खून या लार के बहुत छोटे नमूनों से डीएनए फिंगरप्रिंटिंग करके अपराधी की पहचान करने में।

  • बीमारियों की जांच (Medical Diagnostics): HIV, कोविड-19 (RT-PCR), हेपेटाइटिस और आनुवंशिक बीमारियों का शुरुआती और सटीक पता लगाने में।

  • जीन क्लोनिंग (Gene Cloning): किसी खास जीन की कई प्रतियां तैयार करके आगे के शोध कार्य करने में।

  • पुरातत्व और विकास अध्ययन (Archaeology): प्राचीन fossils या ममी से प्राप्त बहुत पुराने और क्षीण डीएनए का अध्ययन करने में।



डीएनए फिंगरप्रिंटिंग 

(DNA Fingerprinting) 


1. डीएनए फिंगरप्रिंटिंग क्या है? (What is DNA Fingerprinting?)


  • परिभाषा: डीएनए फिंगरप्रिंटिंग किसी व्यक्ति के डीएनए अनुक्रमों में मौजूद विशिष्ट और अद्वितीय पैटर्न (विशिष्टताओं) की पहचान करने की एक प्रयोगशाला तकनीक है।

  • जैसे हर इंसान के हाथों की उंगलियों के निशान (Fingerprints) अलग-अलग होते हैं और किसी से नहीं मिलते, वैसे ही प्रत्येक व्यक्ति का डीएनए पैटर्न भी पूरी तरह अद्वितीय होता है (जुड़वां बच्चों को छोड़कर)।

  • इसकी खोज सर एलेक जेफ्रीज (Sir Alec Jeffreys) ने 1984 में की थी।

2. मुख्य सिद्धांत (Basic Principle)

  • हमारे शरीर का अधिकांश डीएनए (लगभग 99.9%) सभी इंसानों में एक जैसा होता है।

  • डीएनए का केवल एक छोटा सा हिस्सा (लगभग 0.1%) हर व्यक्ति में अलग होता है, जिसमें बार-बार दोहराए जाने वाले छोटे-छोटे न्यूक्लियोटाइड अनुक्रम होते हैं, जिन्हें VNTRs (Variable Number of Tandem Repeats) कहा जाता है।

  • इन VNTRs की लंबाई और दोहराव की संख्या हर व्यक्ति में भिन्न होती है। डीएनए फिंगरप्रिंटिंग मुख्य रूप से इन्हीं VNTRs का विश्लेषण करती है।

3. डीएनए फिंगरप्रिंटिंग के मुख्य चरण (Steps in DNA Fingerprinting)


इस तकनीक को पूरा करने के लिए निम्नलिखित चरणों का पालन किया जाता है:

  1. डीएनए का निष्कर्षण (Isolation): खून, बाल की जड़, लार, वीर्य या त्वचा की कोशिकाओं से डीएनए का नमूना निकाला जाता है।

  2. प्रतिबंध एंजाइमों द्वारा पाचन (Digestion): रेस्ट्रिक्शन एंडोन्यूक्लियेस एंजाइम का उपयोग करके डीएनए को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा जाता है।

  3. इलेक्ट्रोफोरेसिस (Gel Electrophoresis): जेल इलेक्ट्रोफोरेसिस तकनीक के जरिए डीएनए के इन टुकड़ों को उनके आकार (Size) के आधार पर अलग किया जाता है।

  4. ब्लॉटिंग (Southern Blotting): जेल पर मौजूद डीएनए के टुकड़ों को नायलॉन या नाइट्रोसेल्यूलोज झिल्ली (Membrane) पर स्थानांतरित किया जाता है।

  5. हाइब्रिडाइजेशन (Hybridization): रेडियोधर्मी रूप से चिह्नित VNTR-विशिष्ट डीएनए प्रोब (DNA Probes) मिलाए जाते हैं, जो पूरक अनुक्रमों के साथ जुड़ जाते हैं।

  6. ऑटोरैडियोग्राफी (Autoradiography): एक्स-रे फिल्म का उपयोग करके फिल्म पर विशिष्ट पट्टियों (Bands) का पैटर्न देखा जाता है, जिसे 'डीएनए फिंगरप्रिंट' कहा जाता है।

4. प्रमुख उपयोग (Applications of DNA Fingerprinting)


  • फोरेसिक साइंस (Forensic Science): अपराध स्थल (जैसे मर्डर या बलात्कार) पर छूटे हुए खून के धब्बों, बालों या त्वचा के टुकड़ों से अपराधी की पहचान करने में।

  • पितृत्व विवाद (Paternity Testing): किसी बच्चे के जैविक माता-पिता (Father/Mother) की पहचान करने के कानूनी और पारिवारिक विवादों को सुलझाने में।

  • वंश और विकास अध्ययन (Evolution & Genealogy): मानव विकास के इतिहास, प्रवासन (Migration) और विभिन्न प्रजातियों के आपसी संबंधों का अध्ययन करने में।

  • चिकित्सा और आनुवंशिक बीमारियाँ: परिवारों में वंशागत होने वाली गंभीर बीमारियों (जैसे थैलेसीमिया, सिस्टिक फाइब्रोसिस) का शुरुआती पता लगाने में।

क्लोनिंग (Cloning) 


1. परिभाषा (Definition)


क्लोनिंग (Cloning) जैव प्रौद्योगिकी की वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी एकल जीव, कोशिका या डीएनए अणु की आनुवंशिक रूप से बिल्कुल समान (Genetically Identical) प्रतियां तैयार की जाती हैं।

यानी, क्लोनिंग से उत्पन्न होने वाली संतति (Offspring) अपने मूल जीव (Parent) की कार्बन कॉपी होती है, जिसमें डीएनए का क्रम पूरी तरह समान होता है।

2. खोज और इतिहास (Discovery / History)


  • क्लोनिंग की शुरुआत सबसे पहले पादप क्लोनिंग के साथ हुई थी।

  • 1950 के दशक में वैज्ञानिक एफ. सी. स्टीवार्ड (F. C. Steward) ने गाजर की कोशिकाओं से पौधे को विकसित करके यह साबित किया कि एक एकल कायिक कोशिका (Somatic cell) से पूरा जीव बन सकता है।

  • जंतु क्लोनिंग के इतिहास में सबसे बड़ी सफलता 5 जुलाई 1996 को मिली, जब स्कॉटलैंड के रोसलीन संस्थान में वैज्ञानिक इयान विल्मुट (Ian Wilmut) और उनके सहयोगियों ने एक वयस्क भेड़ की कोशिका से 'डॉली' (Dolly) नामक भेड़ को क्लोन किया। यह किसी स्तनधारी जीव का पहला सफल क्लोन था।

3. क्लोनिंग के प्रकार (Types of Cloning)


  • डीएनए क्लोनिंग (DNA Cloning): किसी विशिष्ट जीन या डीएनए खंड की प्रतियां तैयार करना।

  • प्रजनन क्लोनिंग (Reproductive Cloning): किसी संपूर्ण जीव की आनुवंशिक रूप से समान प्रतिकृति (जैसे भेड़ डॉली) तैयार करना।

  • चिकित्सीय क्लोनिंग (Therapeutic Cloning): मानव अंगों या ऊतकों (Tissues) को प्रयोगशाला में विकसित करना ताकि गंभीर बीमारियों का इलाज किया जा सके।

4. महत्व और उपयोग (Importance / Applications)


  • चिकित्सा और अंग प्रत्यारोपण (Medical & Organ Transplants): चिकित्सीय क्लोनिंग के जरिए भविष्य में इंसानों के लिए खराब हो चुके अंगों (जैसे हृदय, गुर्दे या यकृत) को प्रयोगशाला में उगाया जा सकेगा, जिससे अंग प्रत्यारोपण की कमी दूर होगी।

  • कृषि और पशुपालन (Agriculture & Livestock): उच्च गुणवत्ता वाले दुधारू पशुओं या बेहतरीन नस्ल के मवेशियों की संख्या तेजी से बढ़ाने में।

  • लुप्तप्राय प्रजातियों का संरक्षण (Conservation of Endangered Species): विलुप्त होने की कगार पर पहुँच चुके दुर्लभ वन्यजीवों की संख्या बढ़ाने के लिए क्लोनिंग तकनीक का उपयोग किया जा रहा है।

  • औषधि उत्पादन: आनुवंशिक रूप से संशोधित जीवों के माध्यम से बहुमूल्य औषधियों और हार्मोनों का बड़े पैमाने पर उत्पादन।

5. प्रमुख उदाहरण (Examples)


क्र.सं.जंतु का नाम (Animal)क्लोन का नाम (Clone Name)वर्षदेश / विशेषता
1.भेड़ (Sheep)डॉली (Dolly)1996स्कॉटलैंड - वयस्क कायिक कोशिका से बनने वाला दुनिया का पहला स्तनधारी क्लोन
2.चूहा (Mouse)क्यूमुलिना (Cumulina)1997अमेरिका - वयस्क कोशिका से क्लोन किया गया पहला चूहा।
3.बिल्ली (Cat)सीसी / कॉपीकैट (CC / CopyCat)2001अमेरिका - पहली क्लोन की गई घरेलू बिल्ली।
4.खच्चर (Mule)इदाहो जेम (Idaho Gem)2003अमेरिका - दुनिया का पहला क्लोन किया गया खच्चर (घोड़े और गधे का संकर)।
5.घोड़ा (Horse)प्रोमेटेया (Prometea)2003इटली - पहली क्लोन की गई घोड़ी।
6.कुत्ता (Dog)स्नूपी (Snuppy)2005दक्षिण कोरिया - दुनिया का पहला सफलतापूर्वक क्लोन किया गया कुत्ता (अफगान हाउंड नस्ल)।
7.भैंस (Buffalo)समरूपा और गरिमा2009भारत (NDRI, करनाल) - भारत में विकसित भैंस के पहले क्लोन।
8.ऊंट (Camel)इंजाज (Injaz)2009दुबई - दुनिया का पहला क्लोन किया गया मादा ऊंट।
9.बंदर (Monkey)झोंग झोंग और हुआ हुआ (Zhong Zhong & Hua Hua)2018चीन - दैहिक कोशिका नाभिक अंतरण (SCNT) तकनीक द्वारा क्लोन किए गए पहले प्राइमेट (बंदर)।

 

पादप ऊतक संवर्धन 

(Plant Tissue Culture) 


1. पादप ऊतक संवर्धन क्या है? (What is Plant Tissue Culture?)

  • परिभाषा: पादप ऊतक संवर्धन एक ऐसी प्रयोगशाला तकनीक है जिसके अंतर्गत किसी पौधे के किसी भाग (जैसे तना, पत्ती, जड़, शिरा या परागकण) या एकल कोशिका को निर्जमीकृत (Sterile) पोषक माध्यम में नियंत्रित परिस्थितियों में उगाकर उससे एक पूरा नया पौधा विकसित किया जाता है।

  • टॉटीपोटेंसी (Totipotency): यह तकनीक इस मूल सिद्धांत पर आधारित है कि पादप कोशिकाओं में यह अनोखी क्षमता होती है कि वे विभाजित होकर एक पूरा नया पौधा बना सकती हैं, जिसे 'टॉटीपोटेंसी' कहा जाता है।

  • जनक: इस तकनीक के मुख्य प्रणेता गॉटलिब हाबेरलैंड्ट (Gottlieb Haberlandt) (1902) थे, जिन्हें प्लांट टिश्यू कल्चर का जनक माना जाता है।

2. मुख्य चरण (Steps in Plant Tissue Culture)


यह प्रक्रिया प्रयोगशाला में निम्नलिखित चरणों में पूरी होती है:

  1. एक्सप्लांट का चयन (Explant Selection): पौधे के स्वस्थ और सक्रिय भाग (जैसे कली या प्ररोह) को चुना जाता है, जिसे 'एक्सप्लांट' कहते हैं।

  2. निर्जमीकरण (Sterilization): एक्सप्लांट और उपकरणों को पूरी तरह रोगाणुमुक्त (Germ-free) किया जाता है ताकि बैक्टीरिया या कवक का संक्रमण न हो।

  3. पोषक माध्यम (Nutrient Medium): एक्सप्लांट को एक अगर-आधारित माध्यम में रखा जाता है जिसमें सभी आवश्यक खनिज लवण, शर्करा (सुक्रोज) और पादप हार्मोन (ऑक्सिन और साइटोकाइनिन) मौजूद होते हैं।

  4. कैस का निर्माण (Callus Formation): पोषक माध्यम पाकर कोशिकाएं तेजी से विभाजित होकर बिना किसी निश्चित आकार के कोशिकाओं का एक समूह बनाती हैं, जिसे कैस (Callus) कहते हैं।

  5. विभेदक और पादप निर्माण (Regeneration): हार्मोन के संतुलन को बदलकर कैस से जड़ें और प्ररोह (Shoots) विकसित किए जाते हैं, जिससे छोटे पौधे (Plantlets) तैयार होते हैं।

  6. रोपण (Hardening): इन छोटे पौधों को पहले ग्रीनहाउस और फिर खेतों या गमलों में मिट्टी में स्थानांतरित किया जाता है।

3. पादप ऊतक संवर्धन के प्रमुख लाभ (Advantages)


  • अल्प समय में अधिक पौधे (Micropropagation): बहुत कम समय और कम जगह में एक साथ हज़ारों या लाखों समान पौधे (Clones) तैयार किए जा सकते हैं।

  • रोगमुक्त पौधे (Disease-free Plants): यदि मूल पौधा वायरस से संक्रमित है, तो भी उसके मेरिस्टेम (शीर्षस्थ ऊतक) का उपयोग करके पूरी तरह रोगमुक्त पौधे उगाए जा सकते हैं।

  • बीजीय असफलता में उपयोगी: ऐसे पौधे जो बीज पैदा नहीं करते या जिनके बीज बहुत मुश्किल से उगते हैं (जैसे ऑर्किड), उन्हें इस तकनीक से आसानी से उगाया जाता है।

  • वर्षभर उत्पादन: मौसम या ऋतु पर निर्भरता के बिना प्रयोगशाला में साल के बारह महीने पौधे तैयार किए जा सकते हैं।

  • दुर्लभ और लुप्तप्राय जातियाँ: विलुप्त होने की कगार पर पहुँच चुके पौधों के संरक्षण में यह तकनीक बहुत मददगार है।

4. मुख्य अनुप्रयोग (Applications)


  • वाणिज्यिक पुष्पकृषि (Commercial Floriculture): सजावटी फूलों (जैसे गुलाब, ऑर्किड, कार्नेशन) के बड़े पैमाने पर व्यावसायिक उत्पादन में।

  • कृषि और बागवानी: उच्च गुणवत्ता वाली फसलें और फलदार पौधे (जैसे केला, आलू, टमाटर) तैयार करने में।

  • माध्यमिक चयापचय (Secondary Metabolites): औषधीय महत्व के रसायन प्राप्त करने के लिए पादप कोशिकाओं का बड़े पैमाने पर बायो-रिएक्टर में संवर्धन करना।



जैव पेटेंट (Biopatent) 


1. जैव पेटेंट क्या है? (What is a Biopatent?)


  • परिभाषा: जैव पेटेंट (Biopatent) किसी व्यक्ति, संस्था या देश द्वारा किसी जैव प्रौद्योगिकी उत्पाद (Biotechnological Product), प्रक्रिया (Process), या आनुवंशिक रूप से संशोधित जीवों (Genetically Modified Organisms - GMOs) पर दिया जाने वाला एक विशेष कानूनी अधिकार है।

  • अधिकार: यह पेटेंट धारक को एक निश्चित समय के लिए अपने आविष्कार का व्यावसायिक रूप से उपयोग करने का एकाधिकार देता है और दूसरों को बिना अनुमति के इसका उपयोग करने से रोकता है।

  • दायरा: इसमें जीन अनुक्रम (Gene Sequences), सूक्ष्मजीव (Microorganisms), पौधे, जंतु, और सेल लाइनें शामिल होती हैं।

2. जैव पेटेंट से जुड़े प्रमुख मुद्दे और विवाद (Key Issues & Controversies)


  • बायोपाइरेसी (Biopiracy): बहुराष्ट्रीय कंपनियां या विकसित देश बिना अनुमति के विकासशील देशों (जैसे भारत) के पारंपरिक ज्ञान और जैव संसाधनों का उपयोग करके पेटेंट करा लेते हैं।

  • नैतिक और सामाजिक मुद्दे (Ethical Issues): जीवित जीवों (जैसे जानवरों या मानव जीन) पर पेटेंट कराना नैतिकता के खिलाफ माना जाता है। इससे जीवन का व्यापारीकरण होता है।

  • एकाधिकार (Monopoly): कुछ कंपनियों के पास महत्वपूर्ण बीजों या चिकित्सा उत्पादों पर पेटेंट होने से वे कीमतें तय करने में मनमानी कर सकती हैं, जिससे किसानों या आम जनता को नुकसान होता है।

3. भारतीय संदर्भ और बासमती चावल का विवाद (Indian Context & Basmati Case)


  • भारतीय पेटेंट अधिनियम (Indian Patents Act): भारत में जीवन के रूपों (Life Forms) और पारंपरिक ज्ञान के पेटेंट को लेकर कड़े नियम हैं।

  • बायोपाइरेसी का उदाहरण: 1990 के दशक में एक अमेरिकी कंपनी (RiceTec) ने भारतीय बासमती चावल के एक नए संकर (Hybrid) पर अमेरिकी पेटेंट प्राप्त कर लिया था।

  • संघर्ष और जीत: भारत सरकार और वैज्ञानिकों ने इसके खिलाफ कड़ा विरोध दर्ज कराया, जिसके बाद 2001 में उस अमेरिकी पेटेंट के दावों को काफी हद तक खारिज कर दिया गया। यह भारत की बायोपाइरेसी के खिलाफ एक बड़ी जीत थी।

  • नीम और हल्दी: इसी तरह भारत ने हल्दी के औषधीय गुणों और नीम के कवकनाशी गुणों के पेटेंट को भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चुनौती देकर रद्द कराया था।

4. जैव पेटेंट का महत्व (Importance of Biopatents)


  • नवाचार को बढ़ावा (Encouraging Innovation): वैज्ञानिक शोध और नई तकनीकों के विकास के लिए कंपनियों को वित्तीय सुरक्षा मिलती है।

  • आर्थिक लाभ: शोध और विकास (R&D) में निवेश करने वाली कंपनियों और देशों को उनके काम का उचित आर्थिक रिटर्न मिलता है।

  • पारंपरिक ज्ञान की सुरक्षा: उचित पेटेंट नियमों के जरिए देश अपने स्वदेशी संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान के दुरुपयोग को रोक सकते हैं (जीआई टैग आदि के माध्यम से)।


ट्रांसजीनी पादप 

(Transgenic Plants) 

ट्रांसजीनी पादप (Transgenic Plants) वे पौधे होते हैं जिनके आनुवंशिक पदार्थ (DNA) में जेनेटिक इंजीनियरिंग के माध्यम से किसी अन्य जीव (जीवाणु, कवक, जंतु या अन्य पौधे) के वांछित जीन को प्रवेश कराया जाता है। इन पादपों को GMOs (Genetically Modified Organisms) भी कहा जाता है।

1. बीटी कॉटन (Bt Cotton) - कीट प्रतिरोधी कपास

  • जीन स्रोत: यह मिट्टी के एक प्राकृतिक जीवाणु बैसिलस थुरिंजिएंसिस (Bacillus thuringiensis) से प्राप्त किया जाता है।

  • कार्यप्रणाली: इस जीवाणु में एक विशेष जीन होता है जो एक विषैला प्रोटीन (Cry प्रोटीन) बनाता है। जब कपास के गुलाबी सुंडी (pink Bollworm) जैसे कीट इस पौधे के हिस्सों को खाते हैं, तो यह विष उनके पेट में जाकर सक्रिय हो जाता है और उनकी आंतों में छेद करके उन्हें मार देता है।

  • महत्व: इससे कीटनाशकों का छिड़काव कम करना पड़ता है और फसल की पैदावार बढ़ती है। भारत में व्यावसायिक रूप से खेती के लिए स्वीकृत यह प्रमुख ट्रांसजीनी फसल है।

2. गोल्डन राइस (Golden Rice) - विटामिन 'ए' युक्त चावल

  • जीन स्रोत: इसमें डैफोडिल (Daffodil) पौधे और एक जीवाणु (Erwinia uredovora) से जीन डाले गए हैं।

  • कार्यप्रणाली: सामान्य चावल के दानों में बीटा-कैरोटीन (विटामिन 'ए' का पूर्वगामी) नहीं होता। आनुवंशिक संशोधन के बाद इसके चावल के दाने सुनहरे पीले रंग के हो जाते हैं क्योंकि इनमें बीटा-कैरोटीन का निर्माण होने लगता है।

  • महत्व: विकासशील देशों में बच्चों और महिलाओं में होने वाली विटामिन 'ए' की कमी (रतोंधी और कुपोषण) से लड़ने के लिए इसे विकसित किया गया है।

3. फ्लेवर सावर टमाटर (Flavr Savr Tomato) - लंबी शेल्फ-लाइफ वाले टमाटर

  • जीन स्रोत: यह पहला व्यावसायिक रूप से विकसित ट्रांसजीनी खाद्य पौधा था।

  • कार्यप्रणाली: इसमें एक ऐसा 'एंटी-सेंस जीन' डाला गया जो उस एंजाइम (पॉलीगैलक्टुरोनेज़) के निर्माण को रोक देता है जो टमाटर को पकने के बाद जल्दी गलाता या सड़ाता है।

  • महत्व: इसके फल अधिक समय तक ताजे और सख्त बने रहते हैं, जिससे लंबी दूरी तक परिवहन और भंडारण आसान हो जाता है।

4. हर्बिसिसाइड टॉलरेंट सोयाबीन (Herbicide-Resistant Soybean / Roundup Ready)

  • जीन स्रोत: इसे जीवाणुओं से प्राप्त जीन की मदद से तैयार किया गया है।

  • कार्यप्रणाली: इस पौधे में खरपतवारनाशक (जैसे ग्लाइफोसेट) के प्रति सहनशीलता विकसित की जाती है। इसका मतलब है कि खेत में खरपतवार मारने वाली दवा छिड़कने पर भी सोयाबीन का पौधा सुरक्षित रहता है और केवल अवांछित घास-फूस नष्ट होती है।

  • महत्व: इससे निराई-गुड़ाई का खर्च और श्रम दोनों बचते हैं।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ