प्रकाश / Photo / light

 प्रकाश / Photo

पृथ्वी पर प्रकाश सूर्य से आता है। और सूर्य में लगातार नाभिकीय संलयन की अभिक्रिया अभिक्रिया के द्वारा ऊर्जा का निर्माण होता है। इस अभिक्रिया मे हाइड्रोजन के समस्थानिक ($ _{1}^{2}\textrm{H} ,  _{1}^{3}\textrm{H}$) क्रियाकरके हीलियम का निर्माण करते है। इस दौरान उत्पन्न होने वाली ऊर्जा प्रकाश के रूप में उत्पन्न होती है। जो पृथ्वी पर लगभग 8 मिनट 16 20 सैकण्ड का समय लेता है। प्रकाश अनुप्रस्थ तरंग के रूप में संचरित होता है। यह निर्वात मे भी संचरित हो सकता है। प्रकाश का वेग सबसे अधिक निर्वात में ($3\times10^8$) m/s होता है।

प्रकाश का परावर्तन (Reflection of Light)


प्रकाश कि किरण का किसी चिकने परावर्तक पृष्ठ से टकराकर वापस उसी माध्यम में लौट आना प्रकाश का परावर्तन कहलाता है।




परावर्तन के नियमः-

1. प्रकाश की किरण जिस माध्यम से आपतित होती है उसी माध्यम में वह परावर्तित हो जाती है।

2. आपतन कोण का मान परावर्तन कोण के बराबर होता है। (∠i = ∠r)

3. आपतित किरण, परावर्तित किरण एवं अभिलम्ब ये तीनों परावर्तक पृष्ठ के एक ही बिन्दु पर स्थित रहते है।


दर्पण (Mirror)


दर्पण दो प्रकार के होते है।

(i) समतल दर्पण (Plane Mirror):- 

➡ वह दर्पण जिसका परावर्तक पृष्ठ समतल होता है समतल दर्पण कहलाता है।

➡ समतल दर्पण में किसी वस्तु का प्रतिबिम्ब दर्पण के पीछे उतनी ही दूरी पर बनता है। जितनी दूरी पर वस्तु को दर्पण के आगे रखी जाती है।

➡ यदि हमें अपनी सम्पूर्ण लम्बाई का प्रतिबिम्ब समतल दर्पण में देखना हो तो समतल दर्पण कि लम्बाई हमारी लम्बाई से कम से कम आधी होनी चाहिए।

➡ समतल दर्पण में पार्श्व परिवर्तित कि घटना होती है।

➡ प्रतिबिम्ब काल्पनिक, वस्तु के बराबर एवं पार्श्व से उल्टा प्राप्त होता है।

➡ यदि दो समतल दर्पण को समान्तर रखा जाये तो उनके बीच रखी वस्तु के प्रतिबिम्ब अनन्त प्राप्त होते है ।

➡ यदि दो समतल दर्पण ($\theta$) कोण पर झुके हो, तो उनके द्वारा उनके मध्य में रखी वस्तु के बनाए गए कुल प्रतिबिम्बों की संख्या प्रकार निम्न से ज्ञात कि जाती है -


स्थिति – ।

जब 360 में थीटा डिग्री का भाग दिया जाता हैं। तो यदि प्राप्तांक विषम संख्या में प्राप्त होता है। तो वह उत्तर होता है।

यदि दो समतल दर्पणों को 120 डिग्री के कोण पर व्यवस्थित किया जाये तो उनके मध्य रखी वस्तु के कितने प्रतिबिम्ब प्राप्त प्रश्न होंगें।

 उत्तर = 360 / 120 = 3 प्रतिबिम्ब 

स्थिति II

जब 360 में थीटा डिग्री का भाग दिया जाता है। तो प्राप्तांक यदि सम संख्या में प्राप्त होता है। तो उसमें से एक कम कर देने पर प्राप्त मान उत्तर माना जाता है।

प्रश्न- यदि दो समतल दर्पण को 90 डिग्री के कोण पर व्यवस्थित किया जाये तो उनके मध्य रखी वस्तु के कितने प्रतिबिम्ब प्राप्त होंगे।  

उत्तर = 360 / 90 = 4 - 1 = 3 प्रतिबिम्ब 

स्थिति III

जब 360 में थीटा डिग्री का भाग दिया जाता है। तो प्राप्तांक यदि दशमलव भिन्न में प्राप्त होता है। और यदि दशमलव भिन्न के पहले विषम संख्या हो तो वही उत्तर होता है। 

प्रश्न यदि दो समतल दर्पण को 50 डिग्री के कोण पर व्यवस्थित किया जाता है। तो उनके मध्य रखी वस्तु के कितने प्रतिबिम्ब प्राप्त होंगे। 

उत्तर = 360 / 50 =  7.2 = 7 प्रतिबिम्ब

स्थिति - IV

जब 360 डिग्री में थीटा कोण का भाग दिया जाता है। तो प्राप्तांक यदि दशमलव भिन्न में प्राप्त होता है। और यदि दशमलव भिन्न के पहले सम संख्या हो तो उसमें 1 जोड़ देने पर उत्तर प्राप्त होता है। 

प्रश्न - यदि दो समतल दर्पण को 84 डिग्री के कोण पर व्यवस्थित किया जाता है। तो उनके मध्य रखी वस्तु के कितने प्रतिबिम्ब प्राप्त  होंगे। 
उत्तर = 360 / 84=   4.28 = 5 प्रतिबिम्ब 

(ii) गोलीय दर्पण (Spherical Mirror):

वह दर्पण जिसका परावर्तक पृष्ठ गोलीय होता है गोलीय दर्पण कहलाता है। गोलीय दर्पण दो प्रकार के होत है-

(i) उत्तल दर्पण (Convex Mirror):- वह गोलीय दर्पण जिसका परावर्तक पृष्ठ उभरा हुआ होता है उत्तल दर्पण कहलाता है। उत्तल दर्पण को अपसारी व उन्नतो दर्पण भी कहते है। उत्तल दर्पण में प्रतिबिम्ब सदैव आभासी सीधा एवं वस्तु से छोटा बनता है। उत्तल दर्पण का उपयोग वाहनों के पार्श्व में पीछे से आने वाले वाहनों को देखने में किया जाता है।

उत्तल दर्पण में प्रतिबिम्ब का बनना 




(ii) अवतल दर्पण (Concave Mirror):- वह गोलीय दर्पण जिसका परावर्तक पृष्ठ धंसा हुआ होता है। उसे अवतल दर्पण कहते है। इसे अभिसारी दर्पण भी कहते है। अवतल दर्पण के उपयोग दाढी बनाने के दर्पण के रूप में दांत के डॉक्टर द्वारा जाँच करने में, गाडी की हैडलाइट में, सर्चलाइट में तथा सोलर कुकर में किया जाता है।

अवतल दर्पण में प्रतिबिम्ब भिन्न भिन्न स्थितियों में भिन्न-भिन्न बनते है।

1. यदि वस्तु अनन्त पर स्थित हो तो उसका प्रतिबिम्ब पफोकस पर बहुत छोटा, वास्तविक तथा उल्टा बनता है।

2. यदि वस्तु वक्रता केन्द्र एवं अनन्त के बीच स्थित हो तो उसका प्रतिबिम्ब फोकस एवं वक्रता केन्द्र के बीच वस्तु से छोटा, उल्टा एवं वास्तविक बनता है।

3. यदि वस्तु वक्रता केन्द्र पर स्थित है तो उसका प्रतिबिम्ब वक्रता केन्द्र पर ही वस्तु के समान उल्टा एवं वास्तविक बनता है।

4. यदि वस्तु फोकस एवं वक्रता केन्द्र के बीच स्थित हो तो उसका प्रतिबिम्ब वक्रता केन्द्र एवं अनन्त के बीच बड़ा, उल्टा व वास्तविक बनता है।

5. यदि वस्तु पफोकस पर स्थित है तो उसका प्रतिबिम्ब अनन्त पर वस्तु से बहुत बड़ा उल्टा एवं वास्तविक बनता है।

6. यदि वस्तु फोकस तथा ध्रुव के बीच स्थित हो तो उसका प्रतिबिम्ब दर्पण के पीछे बहुत बड़ा, सीधा एवं आभासी बनता है।





शेविंग दर्पण में व्यक्ति P तथा मुख्य फोकस F के मध्य स्थित रहता है।

दर्पण सूत्र :-

दर्पण के ध्रुव से वस्तु तक की दूरी u, दर्पण के ध्रुव से प्रतिबिम्ब तक की दूरी तथा फोकस दूरी f से प्रदर्शित की जाती है तथा इन तीनों राशियों में निम्नलिखित संबंध होता है - $\frac{1}{v}+\frac{1}{u}=\frac{1}{f}$

आर्वधन (Magnification)

गोलीय दर्पण द्वारा उत्पन्न आवर्धन से यह ज्ञात होता है कि कोई प्रतिबिम्ब, बिम्ब की अपेक्षा कितने गुणा आवर्धित है। इसे प्रतिबिम्ब की ऊँचाई तथा बिम्ब की ऊँचाई के अनुपात के रूप में व्यक्त किया जाता है।

आवर्धन (m) = $\frac{h'}{h}$ या  $\frac{-v}{u}$



आवर्धन का मान ऋणात्मक एवं v > u है तो प्रतिबिम्ब वास्तविक, उल्टा एवं आवर्धित होगा ।

आवर्धन का मान ऋणात्मक एवं v = u है तो प्रतिबिम्ब वास्तविक, उल्टा एवं बिम्ब के समान होगा

आवर्धन का मान ऋणात्मक एवं v < u है तो प्रतिबिम्ब वास्तविक, उल्टा एवं बिम्ब से छोटा होगा ।

आवर्धन का मान धनात्मक एवं v > u है तो प्रतिबिम्ब आभासी, सीध एवं बिम्ब से बड़ा होगा ।



वक्रता त्रिज्या R व फोकस दूरी  f में संबंध ⇒ R = 2f  ⇒ $f = \frac{R}{2}$

प्रश्न :- एक व्यक्ति का चेहरा शेविंग दर्पण से 20 सेमी. है। यदि शेविंग दर्पण की फोकस दूरी 80 सेमी है तो बनने वाले प्रतिबिम्ब की दर्पण से दूरी एवं आवर्धनता ज्ञात करो।

(अ) प्रतिबिम्ब आभासी, उल्टा एवं बिम्ब से 1.33 गुणा छोटा होगा।

(ब) प्रतिबिम्ब आभासी, सीधा एवं बिम्ब से 1.33 गुणा छोटा होगा।

(स) प्रतिबिम्ब आभासी, सीधा एवं बिम्ब से 1.33 गुणा बड़ा होगा।

(द) प्रतिबिम्ब वास्तविक, उल्टा एवं बिम्ब से 1.33 गुणा छोटा होगा।

Ans - (स)

प्रश्न :- एक उत्तल दर्पण की फोकस दूरी 30 सेमी. है। यदि एक बिम्ब का आभासी प्रतिबिम्ब दर्पण से 20 सेमी. दूरी पर बनता है। तो दर्पण से बिम्ब की दूरी ज्ञात कीजिए।

(अ) - 45 सेमी 
(ब) - 60 सेमी
(स) + 60 सेमी
(द) + 90 सेमी

Ans - (ब)

प्रश्न :- एक मोटर साइकिल के पार्श्व में लगे दर्पण से एक कार 4 मीटर की दूरी पर है। यदि दर्पण की फोकस दूरी 1 मीटर हो तो दर्पण में दिखने वाले कार के प्रतिबिम्ब की स्थिति एवं प्रकृति ज्ञात कीजिए।

(अ) प्रतिबिम्ब दर्पण से 0.8 मी. की दूरी पर आभासी, सीधा एवं बिम्ब से 0.2 गुणा छोटा बनेगा।

(ब) प्रतिबिम्ब दर्पण से 0.8 मी. की दूरी पर आभासी, उल्टा एवं बिम्ब से 0.2 गुणा छोटा बनेगा।

(स) प्रतिबिम्ब दर्पण से 0.8 मी. की दूरी पर आभासी, सीधा एवं बिम्ब से 0.2 गुणा बड़ा बनेगा।

(द) प्रतिबिम्ब दर्पण से 0.8 मी. की दूरी पर वास्तविक, सीधा एवं बिम्ब से 0.2 गुणा छोटा बनेगा।

Ans - (अ)

प्रकाश का अपवर्तन (Refraction of Light)


"जब कोई प्रकाश किरण एक माध्यम से दूसरे माध्यम में प्रवेश करती है तो उसका पथ विचलित हो जाता है इस घटना को प्रकाश का अपवर्तन कहते है।"




अपवर्तन के नियम (Laws of Refraction):-

1. आपतित किरण, अपवर्तित किरण एवं अभिलम्ब सभी अपवर्तक पृष्ठ के एक ही बिन्दु पर स्थित रहते है।

2. आपतन कोण ($ \angle i$) की ज्या (sin $i$) एवं अपवर्तन कोण ($ \angle r$) की ज्या (sin $r$) का अनुपात सदैव स्थिर रहता है अर्थात् ( $\frac{sin i}{sin r}$ - स्थिरांक )  इसे "स्नेल का नियम" भी कहते है।

3. जब प्रकाश कि किरण विरल माध्यम से सघन माध्यम में प्रवेश करती है। तो वह अभिलम्ब की ओर झुक जाती है। और जब प्रकाश कि किरण सघन माध्यम में प्रवेश करती है तो वह अभिलम्ब से दूर हटती है।

अपवर्तन के उदाहरण - 

1. आकाश में रात्रि को तारों का टिम-टिमाते हुए दिखाई देना।

2. समुद्र के पैदे में पड़ी मछली का वास्तविक गहराई से कुछ उफपर उठा हुआ दिखाई देना।

3. पानी के गिलास में रखें सिक्के का उफपर उठा हुआ दिखाई देना।

4. पानी में आंशिक खूबी हुई छड़ का तिरछा दिखाई देना।

5. सूर्योदय के पहले एवं सूर्यास्त के बाद दो मिनट तक सूर्य का दिखाई देना।

अपवर्तनांक (Refractive Index) : निवार्त में प्रकाश की चाल (3 x $10^8$ m/s) एवं माध्यम में प्रकाश की चाल के अनुपात को अपवर्तनांक कहते है।

माध्यम का अपवर्तनांक -

 माध्यम

 अपवर्तनांक

 काँच

 1.5

 वायु

 1.0003

 जल

 1.33

 एल्कोहॉल

 1.36

 कैरोसिन

 1.44

 तारपीन का तेल व ग्लिसरीन

 1.47

 रूबी (माणिक्य)

 1.71

 नीलम

 1.77

 हीरा

 2.42

 बेंजीन

 1.52

 कार्बन डाई सल्फाइड

 1.64

 निर्वात

 1





प्रश्न : यदि पानी का आपवर्तनांक 1.33 हो एवं कांच का अपवर्तनांक 1.5 हो तो पानी के सापेक्ष कांच का अपवर्तनांक ज्ञात कीजिए।

उत्तर = 1.5/1.33 = 1.12

लेंस (Lens)


दो पृष्ठों से घिरा हुआ कोई पारदर्शी माध्यम, जिसका एक या दोनों पृष्ठ गोलीय है लेंस कहलाता है। लेंस में कम से कम एक पृष्ठ गोलीय होता है।

लेंस दो प्रकार के होते है-

(i) उत्तल लेंस (Convex Lens): वह लेंस जिसके किनारे पतले एवं बीच से मोटा होता है। उत्तल लेंस कहलाता है। इसे अभिसारी लेंस भ

कहते है क्योंकि यह प्रकाश कि किरणों को केन्द्र की ओर मोड़ता है।




नोटः-उत्तल लेंस का उपयोग दूर दृष्टि दोष के निवारण में तथा सूक्ष्मदर्शी व दूरदर्शी में किया जाता है।

उत्तल लेंस में बिम्ब की विभिन्न स्थितियों में स्थितियों में प्रतिबिम्ब का विवरण

 क्र.स.

 बिम्ब की स्थिति

 प्रतिबिम्ब की स्थिति

 प्रतिबिम्ब कि प्रकृति

 1.

 अनंत पर

 फोकस $F_{2}$ पर

वास्तविक, उल्टा व बिंदु साईज

 2.

$2F_{1}$ से पहले 

 $F_{2}$ व $2F_{2}$ के बीच

वास्तविक, उल्टा व बिम्ब से छोटा

 3.

$F_{1}$

 $2F_{2}$ पर

वास्तविक, उल्टा व बिम्ब के बराबर

 4.

 $2F_{1}$ व $F_{1}$ के बीच 

$2F_{2}$ आगे

वास्तविक, उल्टा व बिम्ब से बड़ा

 5.

 $F_{1}$ पर

 अनन्त पर

वास्तविक, उल्टा व बिम्ब से बहुत बड़ा

 6.

 F1 व प्रकाशिक केन्द्र के बीच

 बिम्ब के पीछे

आभासी, सीधा व बिम्ब से बड़ा


 
(ii) अवतल लेंस (Concave Lens): वह लेंस जिसके किनारे मोटे तथा बीच में से पतला होता है अवतल लेंस कहलाता है। इसे अपसारी लेंस भी कहते है। क्योंकि यह प्रकाश की किरणों को केन्द्र से दूर की ओर मोड देता है।




अवतल लेन्स का उपयोग निकट दृष्टि दोष के निवारण में किया जाता है।

लेंस सूत्र (Lens Formula) :- $\frac{1}{v}-\frac{1}{u}=\frac{1}{f}$

आवर्धन (Magnification)

यदि आवर्धन क्षमता का मान 1 हो तथा व बराबर हो तो प्रतिबिम्ब उल्टा, वास्तविक एवं बिम्ब के बराबर होगा।

यदि आवर्धन क्षमता का मान1 से अधिक हो तथा v, u से अधिक हो तो प्रतिबिम्ब उल्टा, वास्तविक एवं बिम्ब से बड़ा होगा।

'यदि आवर्धन क्षमता का मान 1 से कम हो तथा v, u से छोटा हो तो प्रतिबिम्ब उल्टा, वास्तविक एवं बिम्ब से छोटा होगा।

यदि आवर्धन क्षमता का मान +1 हो तथा व बराबर हो तो प्रतिबिम्ब सीधा, आभासी एवं बिम्ब के बराबर होगा।

लेंस की क्षमता (Power of lens) :-

"किसी लेंस द्वारा प्रकाश किरणों को अपसारित या अभिसारित करने की मात्र को उसकी क्षमता के रूप में व्यक्त किया जाता है। इसे P से प्रदर्शित करते है।"

किसी  f फोकस दूरी के लेंस की क्षमता $p =\frac{1}{f}$

f = मीटर में

लेंस की क्षमता का मात्रक डाइऑप्टर (D) या प्रति मीटर

उत्तल लेंस की लेंस क्षमता धानात्मक तथा अवतल लेंस की लेंस क्षमता ऋणात्मक होती है।

यदि हम दो या दो से अधिक जेंस को मिला देंवे तो उस संयोजन की परिणामी क्षमता P = P1 +P2 + P3 +......

गोलीय लेंसों की चिह्न परिपाटी

1. सभी दूरियाँ लेंसों के प्रकाशिक केन्द्र से मापी जाती है।

2. उत्तल लेंस की फोकस दूरी धानात्मक तथा अवतल लेंस की ऋणात्मक ली जाती है।

3. प्रकाशिक केन्द्र के बाई ओर की दूरियाँ ऋणात्मक तथा दाई ओर की धनात्मक मापी जाती है। प्रकाशिक केन्द्र के ऊपर की दूरियाँ धानात्मक एवं नीचे की दूरियों ऋणात्मक मापी जाती है।





प्रश्न :- 

1. एक गोलीय दर्पण की वक्रता त्रिज्या 20 सेमी है इसकी फोकस दूरी क्या होगी?

हलः दिया गया है $R = 20cm$      $f = ?$

$f =\frac{R}{2}$

= $\frac{20}{2}$ = 10 सेमी 

2. उस उत्तल दर्पण की फोकस दूरी ज्ञात कीजिए जिसकी वक्रता त्रिज्या 32 सेमी है?

हलः दिया गया है-

उत्तल दर्पण की वक्रता त्रिज्या इसकी फोकस दूरी R = +32 सेमी 

f = R/2 = +32/2 = +16

f = +16 सेमी

3. कोई अवतल दर्पण अपने सामने 10 सेमी दूरी पर रखे किसी बिम्ब का तीन गुणा आवधिर्धात (बड़ा) वास्तविक प्रतिबिम्ब बनाता है प्रतिबिम्ब दर्पण से कितनी दूरी पर है?

हलः दिया गया है
m = - 3 प्रतिबिम्ब की दूरी v = ?
बिम्ब की दूरी u = - 10 सेमी, 

$\therefore m =\frac{-v}{u}$ 

$-3 =\frac{-v}{-10}$

अत: v = -30 सेमी



प्रकाश का वर्ण विक्षेपण

श्वेत प्रकाश की किरण से रंगों का अलग होना वर्ण-विक्षेपण कहलाता है। जब सूर्य के श्वेत प्रकाश को प्रिज्म से होकर गुजारा जाता है, तो वह अपवर्तन की घटना के पश्चात् प्रिज्म के आधार भाग की ओर मुड़कर अपने वास्तविक सात रंगों में विभाजित हो जाता है इस प्रकार से प्राप्त रंगों की पट्टी को स्पेक्ट्रम कहते है तथा इस घटना को प्रकाश का वर्ण विक्षेपण कहते है।

श्वेत प्रकाश में निम्न सात रंग पाये जाते है।

V I B G Y O R


'लाल रंग के प्रकाश की तरंग दैर्ध्य का मान सर्वाधिक होता है इसलिए इसका विक्षेपण कोण सबसे कम होता है। अर्थात् लाल रंग सबसे कम झुकता है।

बैंगनी रंग के प्रकाश की तरंग दैर्ध्य का मान सबसे कम होता है इसलिए इसका विक्षेपण कोण सबसे अधिक होता है। अर्थात् बैंगनी रंग सबसे अधिक झुकता है।

नोटः स्पैक्ट्रम में सबसे ऊपर लाल रंग बीच में हरा रंग एवं सबसे नीचे बैंगनी रंग होता है।

इंद्रधनुष की घटना परावर्तन, पूर्ण आंतरिक परावतर्न, अपवर्तन एवं वर्ण-विक्षेण की घटना द्वारा बनती है।

रंगों का मिश्रण

सामान्यत रंग तीन प्रकार के होते है-

(i) प्राथमिक रंग

(ii) द्वितीयक रंग

(iii) संपूरक रंग

(i) प्राथमिक रंग वे रंग जिनको अन्य रंगों के मिश्रण से प्राप्त नहीं किया जा सकता है। प्राथमिक रंग कहलाते है, जैसे लाल, हरा व नीला।

R  - Red/लाल
G - Green/हरा
B - Blue/नीला

(ii) द्वितीयक रंग वे रंग जिनका निर्माण सामान्यतः प्राथमिक रंगों को मिलाने से होता है। द्वितीयक रंग कहलाते है, जैसे मैजेन्टा, स्यान (पीकॉक नीला) व पीला।

(iii) संपूरक रंग: जब दो या अधिक रंगों के मिश्रण से श्वेत रंग उत्पन्न होता है। उस समय उन रंगों को संपूरक रंग कहते है।

उदाहरण लाल + स्यान = सफेद

नोट :- रंगीन टेलीविजन में तीनों प्राथमिक रंगों लाल, हरा, एवं नीला रंग का उपयोग किया जाता है।

नीला + पीला = सफेद

लाल + हरा + नीला = सफेद

पीला + मैजेन्टा + स्यान = सफेद

हरा + मैजेन्टा = सफेद

नेत्र, दृष्टि दोष एवं उनका निवारण

नेत्र की संरचना :- मानव नेत्र की कार्यप्रणाली एक अत्याधुनिक ऑटोफोकस कैमरे की तरह होती है। नेत्र लगभग 2.5 सेमी. व्यास का एक गोलाकार अंग है जिसके प्रमुख भाग निम्न होते है

1. श्वेत पटल (Sclera) नेत्र के चारों ओर एक श्वेत सुरक्षा कवच बना होता है जो अपारदर्शक होता है। इसे श्वेत पटल कहते है।

2. कॉर्निया (Cornea) नेत्र के सामने श्वेत पटल के मध्य में थोडा उभरा हुआ भाग पारदर्शी होता है। प्रकाश की किरणें इसी भाग से अपवर्तित होकर नेत्र में प्रवेश करती है।

3. परितारिका (Iris) यह कॉर्निया के पीछे एक अपारदर्शी मांसपेशिय रेशों की संरचना है जिसके बीच में छिद्र होता है। इसका रंग अधिकांशतः काला होता है।

4. पुतली (Pupil) - परितारिका के बीच वाले छिद्र को पुतली कहते है। परितापिका की मांसपेशियों के संकोचन व विस्तारण से आवश्यकतानुसार पुतली का आकार कम या ज्यादा होता रहता है। तीव्र प्रकाश में इसका आकार छोटा हो जाता है एंव कम प्रकाश में इसका आकार बढ़ जाता है। यही कारण है कि जब हम तीव्र प्रकाश से मन्द प्रकाश में जाते है। तो कुछ समय तक नेत्र ठीक से देख नहीं पाते है। थोडी देर मे पुतली का आकार बढ़ जाता है एवं हमें दिखाई देने लगता है।

5. नेत्र लेंस (Eye Lens) - परितारिका के पीछे एक लचीले पारदर्शक पदार्थ का लेंस होता है। जो माँसपेशियों की सहायता से अपने स्थान पर रहता है। कॉर्निया से अपवर्तित किरणें को रेटिना पर फोकसित करने के लिये माँसपेशियों के दबाव से इस लेंस की वक्रता त्रिज्या में थोड़ा परिवर्तन होता है। इससे बनने वाला प्रतिबिम्ब छोटा, उल्टा व वास्तविक होता है।

6. जलीय द्रव (Aqueous Humor) नेत्र लेंस व कॉर्निया के बीच एक पारदर्शक पतला द्रव भरा रहता है जिसे जलीय द्रव कहते है। यह इस भाग में उचित दबाव बनाए रखता है। ताकि आँख लगभग गोल बनी रहे। साथ ही कॉर्निया व अन्य भागों को पोषण भी देता रहता है।

7. रक्त पटल (Choroid) नेत्र के श्वेत पटल के नीचे एक झिल्ली नुमा संरचना होती है जो रेटिना को ऑक्सीजन एवं पोषण प्रदान करती है। साथ ही आंख में आने वाले प्रकाश का अवशोषण करकके भीतरी दीवारों से प्रकाश के परावर्तन को अवरूद्ध करती है।

8. दृष्टिपटल (Retina) रक्त पटल के नीचे एक पारदर्शक झिल्ली होती है। जिसे दृष्टिपटल कहते है। वस्तु से आने वाली प्रकाश किरणें कॉर्निया एवं नेत्र लेंस से अपवर्तित होकर रेटिना पर फोकसित होती है रेटिना में अनेक प्रकाश सुग्राही कोशिकाएं होती है जो प्रकाश मिलते ही सक्रिय हो जाती है एवं विद्युत सिग्नल उत्पन्न करती है। रेटिना से उत्पन्न प्रतिबिम्ब के विद्युत सिग्नल प्रकाश नाड़ी द्वारा मस्तिष्क को प्रेशित होते है। मस्तिष्क इस उल्टे प्रतिबिम्ब का उचित संयोजन करके हमें सीधा दिखाता है।

9. काचाभ द्रव (Vitreous humor) नेत्र लेंस व रेटिना के बीच एक पारदर्शक द्रव भरा होता है जिसे काचाभ द्रव कहते है।

नेत्र जब सामान्य अवस्था में होता है तो अनन्त दूरी पर रखी वस्तुओं का प्रतिबिम्ब रेटिना पर स्पष्ट बन जाता है। जब वस्तु नेत्र के पास होती है। तो नेत्र लेंस की मांसपेशियां स्वतः एक तनाव उत्पन्न करती है। जिससे नेत्र लेंस बीच में से मोटा हो जाता है। इससे नेत्र लेंस की फोकस दूरी कम हो जाती है। एंव पास की वस्तु का प्रतिबिम्ब पुनः रेटिना पर बन जाता है। लेंस की फोकस दूरी में होने वाले इस परिवर्तन की क्षमता को नेंत्र की समंजन क्षमता कहा जाता है।

यदि हम बहुत निकट से किसी वस्तु को स्पष्ट देखना चाहें तो हमें स्पष्ट प्रतिबिम्ब देखने में कठिनाई का अनुभव होता है। वस्तु की नेत्र से वह न्यूनतम दूरी जहां से वस्तु को स्पष्ट देख सकते हैं नेत्र का निकट बिन्दु कहलाता है। सामान्य व्यक्ति के लिए यह दूरी 25 सेमी होती है। इसी प्रकार नेत्र से वह अधिकतम दूरी, जहाँ तक वस्तु को स्पष्ट देखा जा सकता है। नेत्र का दूर बिन्दु कहलाता है। सामान्य नेत्रों की दूरी अनन्त होती है। निकट बिन्दु से दूर बिन्दु के बीच की दूरी दृष्टि परास कहलाती है।

दृष्टि दोष एवं उनका निवारण :-

1. निकट दृष्टि दोष (Myopia or short sightedness) निकट दृष्टि दोष में व्यक्ति को निकट की वस्तुएँ तो स्पष्ट दिखाई देती है। किन्तु दूर की वस्तुएँ धुंधली दिखाई देती है। इस दृष्टि दोष का मुख्य कारण नेत्र लेंस की वक्रता त्रिज्या का बढ़ जाना है। जिससे लेंस मोटा हो जाता है। और लेंस कि फोकस दूरी का मान कम हो जाता है। व लेंस क्षमता का मान बढ़ जाता है। इस दोष से पीड़ित व्यक्ति के नेत्र से दूर रखी वस्तुओं का प्रतिबिम्ब रेटिना से पहले ही बन जाता है। जबकि कुछ दूरी पर रखी वस्तुओं का प्रतिबिम्ब रेटिना पर बनता है। अतः उस व्यक्ति का दूर बिन्दु अनन्त पर न होकर पास आ जाता है।

इस दोष के निवारण के लिये उचित क्षमता वाले अवतल लेंस के चश्में का उपयोग किया जाता है।

2. दीर्घ / दूर दृष्टि दोष (Hypermetropia or long sightedness) दूर दृष्टि दोष में व्यक्ति को दूर की वस्तुएं तो स्पष्ट दिखाई देती है। परन्तु पास की वस्तुएं स्पष्ट दिखाई नही देती है। इस दोष में व्यक्ति को सामान्य निकट बिन्दु से वस्तुएं धुंधुली दिखती है, लेकिन जैसे जैसे वस्तु को 25 सेमी. से दूर ले जाते है, वस्तु स्पष्ट होती है। एक प्रकार से दीर्घ दृष्टि दोष में व्यक्ति का निटक बिन्दु दूर हो जाता है। क्योंकि लेंस कि वक्रता त्रिज्या कम हो जाती है। और फोकस दूरी बढ़ जाती है व लेंस क्षमता कम हो जाती है। दीर्घ दृष्टि दोष के निवारण के लिये उचित क्षमता वाले उत्तल लेंस के चश्में का उपयोग किया जाता है।

3. जरा दूरदर्शिता (Presbyopia) :- आयु बढ़ने के साथ नेत्र लेंस एवं मासपेशियों का लचीलापन कम होने से नेत्र की समंजन क्षमता कम हो जाती है। इस कारण उन्हे दीर्घ दृष्टि दोष हो जाता है। एवं वे पास की वस्तुओं को स्पष्ट नहीं देख पाते है। कई बार उम्र के साथ व्यक्तियों को दूर की वस्तुएं भी धुंधली दिखाई देने लगती है। इस तरह के दोषों में व्यक्ति को दूर व पास दोनों ही वस्तुओं को स्पष्ट देखने में दिक्कत आने लगती है। इनका निवारण करने के लिये द्वि फोकसी लेंस प्रयुक्त किये जाते है। इन लेंसों का ऊपरी भाग अवतल व नीचे का भाग उत्तल होता है।

4. दृष्टि वैषम्य दोष (Astigmatism) दृष्टि वैषम्य दोष या अबिन्दुकता दोष कॉर्निया की गोलाई अनियमितता के कारण होता हैं। इसमें व्यक्ति को समान दूरी पर रखी उर्ध्वाधर व क्षैतिज रेखाएं एक साथ स्पष्ट दिखाई नहीं देती है। बेलनाकार लेंस का उपयोग करके इस दोष का निवारण किया जाता है।

5. मोतियाबिन्द (Cataract) व्यक्ति की आयु बढ़ने के साथ नेत्र लेंस की पारदर्शिता खत्म होने लगती है। एवं उसका लचीलापन कम होने लगता है। इस कारण यह प्रकाश का परावर्तन करने लगता है। एवं वस्तु स्पष्ट दिखाई नहीं देती है। इस दोष को मोतियाबिन्द कहते है। इस दोष को दूर करने के लिए नेत्र लेंस को हटाना पडता है। पूर्व में शल्य चिकित्सा द्वारा मोतियाबिन्द को निकाल दिया जाता था। नेत्र लेंस को निकाल देने से व्यक्ति को मोटा व गहरे रंग का चश्मा लगाना पडता था। आधुनिक विधि में मोतियाबिन्द युक्त नेत्र लेंस को हटाकर एक कृत्रिम लेंस लगा दिया जाता है जिसे इन्द्रा आक्युलर लेंस कहते है।

प्रकाश का प्रकीर्णन

पदार्थ के द्वारा श्वेत प्रकाश को अवशोषित कर एक विशेष रंग के प्रकाश को उत्सर्जित करना प्रकीर्णन कहलाता है। इसके कारण आकाश नीला दिखाई देता है और पेड़ की पत्तियां हरे रंग की दिखाई देती है।


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