गुणसूत्र (Chromosomes)
गुणसूत्र (Chromosomes)
खोजकर्ता एवं नामकरणकर्ता
पादप कोशिकाओं में: इदुआर्ड स्ट्रॉसबर्गर (Eduard Strasburger, 1875) ने पौधों की कोशिकाओं में कोशिका विभाजन के दौरान गुणसूत्रों की विस्तृत खोज की थी।जंतु कोशिकाओं में: वाल्थर फ्लेमिंग (Walther Flemming, 1879) ने जंतु कोशिकाओं में गुणसूत्रों तथा समसूत्री विभाजन (Mitosis) की खोज की। और क्रोमेटिन नाम दिया |
नामकरण (Terminologist): डब्ल्यू. वाल्डेयर (W. Waldeyer, 1888) ने इन्हें "क्रोमोसोम" (Chromosome) नाम दिया (ग्रीक शब्द: Chroma = रंग, Soma = शरीर)।
- आनुवंशिक भूमिका: सटन और बोवेरी (Sutton and Boveri, 1902) ने वंशागति का गुणसूत्र सिद्धांत (Chromosome Theory of Inheritance) प्रतिपादित किया।
गुणसूत्र का रासायनिक संगठन
(Chemical composition of chromosome)
गुणसूत्र क्रोमेटिन पदार्थ का बना होता है। गुणसूत्र के मुख्य रासायनिक अवयव DNA, RNA हिस्टोन प्रोटीन (histone protein) तथा अहिस्टोन प्रोटीन (non-histone protein) होते हैं। क्रोमेटिन में DNA की अपेक्षा प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है।
1. डी.एन.ए. (DNA) : क्रोमेटिन के रासायनिक अवयवों में सबसे महत्वपूर्ण अवयव DNA है। यह आनुवंशिकता नियन्त्रण का कार्य करता है। स्तनधारियों के अगुणित जीनोम (haploid genome) में DNA की मात्रा जीवाणुओं की अपेक्षा 1000 गुनी होती है। DNA की ये लम्बी-लम्बी इकाइयाँ छोटे-छोटे गुणसूत्रों में किस प्रकार व्यवस्थित रहती हैं इसका पता आणविक जीव वैज्ञानिकों को 1975 के बाद ही चल पाया।
2. आर.एन.ए (RNA) : अधिकतर जीवों के गुणसूत्रों में इसकी मात्रा बहुत कम होती है।
3. हिस्टोन प्रोटीन (Histone protein) : ये गुणसूत्री प्रोटीन पाँच प्रकार की होती हैं- (i) IH1 इसमें क्षारीय अमीनो अम्ल लाइसिन (lysine) काफी अधिक मात्रा में तथा आरजीनीन (arginine) कम में होता है, (ii) H2A, (iii) H2B इन दोनों हिस्टोनों में लाइसिन कुछ अधिक मात्रा में होता है, (iv) H3 तथा (v) H4 इन दोनों हिस्टोनों में आरजीनीन अधिक मात्रा में होता है। हिस्टोनों का कार्य संरचनात्मक होता है किन्तु ये नियमन कार्य भी कर सकते हैं।
4. अहिस्टोन प्रोटीन (Non-histone protein): विभिन्न प्रकार के जीनों में इनकी संख्या 12 से 20 या इससे अधिक हो सकती है। एक ही प्राणी के विभिन्न ऊतकों में अहिस्टोन प्रोटीन भिन्न-भिन्न हो सकती हैं। इनका कार्य विशिष्ट प्रकार के जीवों की क्रियाशीलता को नियमित करना है।
जंतु कोशिकाओं में: वाल्थर फ्लेमिंग (Walther Flemming, 1879) ने जंतु कोशिकाओं में गुणसूत्रों तथा समसूत्री विभाजन (Mitosis) की खोज की। और क्रोमेटिन नाम दिया |
नामकरण (Terminologist): डब्ल्यू. वाल्डेयर (W. Waldeyer, 1888) ने इन्हें "क्रोमोसोम" (Chromosome) नाम दिया (ग्रीक शब्द: Chroma = रंग, Soma = शरीर)।- आनुवंशिक भूमिका: सटन और बोवेरी (Sutton and Boveri, 1902) ने वंशागति का गुणसूत्र सिद्धांत (Chromosome Theory of Inheritance) प्रतिपादित किया।
गुणसूत्र का रासायनिक संगठन
(Chemical composition of chromosome)
गुणसूत्र की संरचना
गुणसूत्र की संरचना - न्यूक्लियोसोम मॉडल (Structure of Chromosome-Nucleosome Model)
कोशिका विभाजन के अतिरिक्त गुणसूत्र अनिश्चित आकार के जालक (net work) के रूप में दिखाई देते हैं। इसमें गहरे रंग युक्त कणिकाएँ (granules) तथा धागे (strands) सदृश्य रचना दिखाई देती हैं जिसे क्रोमेटिन (chromatin) कहते हैं।
1. क्रोमेटिन तन्तु (Chromatin fibres) : केन्द्रक द्रव्य (nucleoplasm) में केन्द्रक का आनुवंशिक भाग महीन धागों की जालिका के रूप में होता है जिसे क्रोमेटिन तन्तु (chromatin fibres) कहते हैं। ये अन्तरावस्था (inter-phase) में देखे जा सकते हैं और यह ऐसिटोकार्मिन (acetocarmine) या क्षारीय रंजक (basic stains) ग्रहण करते हैं जैसे क्षारीय फुशिन (basic fuchsin) । क्रोमेटिन तन्तु दो आकार में होते हैं :
(a) हेटरोक्रोमेटिन (Heterochromatin) : यह गाढ़ा रंजित (dark staining) भाग होता है इसमें अधिक मात्रा में आर.एन.ए. और थोड़ी मात्रा में डी.एन.ए. होता है। इसे आनुवंशिक रूप से निष्क्रिय (genetically inert) माना जाता है। ये केन्द्रिक (nucleolus) के इर्द-गिर्द तथा केन्द्रक (nucleus) की परिधि पर मिलते हैं। हेटेरोक्रोमेटिन तीन संरचनाओं के रूप में मिलते हैं-वर्णक कणिकाएँ (chromomeres), परिसूत्र बिन्दु (chromocentres) तथा घुंडियाँ (knobs) ।
(b) यूक्रोमेटिन (Euchromatin) : ये क्रोमेटिन का हल्का रंजित (light staining) भाग है। इसमें DNA अधिक मात्रा में होता है। इसे आनुवंशिक रूप से सक्रिय (genetically active) भाग माना जाता है।
कोशिका विभाजन के समय क्रोमेटिन तन्तु अपने आप को गुणसूत्र (chromosome) के रूप में संगठित कर लेते हैं। मध्यावस्था (metaphase) में दिखने वाले गुणसूत्र में निम्न भाग होते हैं :
1. क्रोमेटिड अथवा अर्धगुणसूत्र (Chromatids) : मेटाफेज की अवस्था में क्रोमोसोम में दो सममित धागे जैसे रज्जुक होते हैं जिन्हें क्रोमेटिड (chromatids) कहते हैं। एक क्रोमेटिड आधा गुणसूत्र दर्शाता है। ऐनाफेज़ क्रोमोसोम में एक क्रोमेटिड होता है।
2. क्रोमोनीमा अथवा वर्णसूत्र (Chromonema) : प्रोफेज (prophase) अवस्था में प्रत्येक क्रोमेटिड में पतले और कुंडलित (coiled) तन्तु होते हैं जो क्रोमोनीमा कहलाते हैं। ये क्रोमोनीमा या क्रोमोनीमेटा क्रोमेटिड की उपइकाइयाँ हैं।
3. क्रोमोमियर अथवा वर्णकणिका (Chromomeres): क्रोमोनीमेटा की पूरी लम्बाई पर क्रोमेटिन पदार्थ दानों की तरह एकत्रित रहता है इन्हें क्रोमोमियर कहते हैं। इन्हें जीन्स माना जाता रहा है।
4. टीलोमियर (Telomere): यह क्रोमोसोम का उच्च छोर (terminal part) है।
5. सेन्ट्रोमियर अथवा गुणसूत्रबिन्दु (Centromere): यह प्राथमिक संकीर्णन (primary constriction) की तरह पाया जाता है जो क्रोमोसोम का पतला क्षेत्र होता है। सेन्ट्रोमियर से माइटोटिक तुर्क जुड़े रहते हैं।
सेंट्रोमियर की उपस्थिति के आधार पर गुणसूत्र
1. अन्तकेन्द्री क्रोमोसोम (Telocentric chromo-some) : इसमें सेन्ट्रोमियर एक सिरे पर होता है और क्रोमोसोम घड़ी के समान होता है।
2. अग्रबिन्दुक क्रोमोसोम (Acrocentric chromo-some) : इसमें सेन्ट्रोमियर सिरे के पास होता है इसलिये क्रोमोसोम में एक लम्बी और एक छोटी भुजा होती है।
3. मध्यकेन्द्री क्रोमोसोम (Metacentric chromo-some) : इनमें सेन्ट्रोमियर मध्य में होता है इसलिये क्रोमोसोम V आकार का होता है।
4. उपमध्यकेन्द्री क्रोमोसोम (Submetacentric chro-mosome) : इसमें सेन्ट्रोमीयर मध्य भाग के पास होता है। इस प्रकार के क्रोमोसोम J या L आकार के होते हैं और इनमें एक लम्बी और दूसरी तुलनात्मक छोटी भुजा होती है।
5. अकेन्द्री क्रोमोसोम (Acentric chromosome) : इनमें सेन्ट्रोमियर का अभाव होता है।
6. द्विकेन्द्री क्रोमोसोम (Dicentric chromosome) : इनमें दो सेन्ट्रोमियर होते हैं।
विशेष प्रकार के गुणसूत्र
(Special Types of Chromosomes)
कुछ प्राणियों में विशेष प्रकार के ऊतक होते हैं जिनमें विशेष गुणसूत्र भी पाए जाते हैं जो निम्न प्रकार हैं :
[1] लार ग्रन्थि गुणसूत्र (Salivary gland chromosome)
काईरोनोमस (Chironomus) कीट तथा फल मक्खी या ड्रॉसोफिला (Drosophila) के लार्वा की लार ग्रन्थि की कोशिकाओं में ई० जी० बैल्वियानी (E. G. Balbiani, 1881) ने महा गुणसूत्र (giant chromosome) का अध्ययन किया। इन गुणसूत्रों का आकार साधारण कोशिकाओं के गुणसूत्रों. से 200 गुना से भी अधिक बड़ा था। वे गुणसूत्र कायिक कोशिकाओं में भी युग्मित (paired) रहते हैं। इन महा गुणसूत्रों की संख्या लार ग्रन्थि कोशिकाओं में साधारण कायिक कोशिकाओं वाले गुणसूत्रों की संख्या से आधी प्रतीत होती है। एकान्तर वर्णिक (chromatic) तथा अवर्णिक (achromatic) भागों की बनी अनुप्रस्थ पट्टियाँ (transverse bands) इन महा गुणसूत्रों पर दिखाई देती हैं। कभी-कभी ये पट्टियाँ उत्क्रमणीय पफ (reversible puff) बनाती हैं जिन्हें गुणसूत्र पफ (Chromosome puff) अथवा बैल्बियानी वलय (Balbiani rings) कहते हैं। इनका सम्बन्ध पफ जीन की क्रियाशीलता से है।
[II] लैंपब्रुश गुणसूत्र (Lampbrush chromosome)
सामान्य गुणसूत्रों के अतिरिक्त कशेरुकी एवं अकशेरुकी प्राणियों के प्राथमिक अंडक (primary oocytes) केन्द्रक में विशेष प्रकार के गुणसूत्र पाए जाते हैं जिन्हें लैंप बुश गुणसूत्र कहते हैं। ये अत्यधिक लम्बे हो जाते हैं। ड्रॉसोफिला के लार्वा की लार ग्रन्थियों के महा गुणसूत्रों से भी ये बड़े हो जाते हैं। ये विशालकाय गुणसूत्र (giant chromosome) यूरोडेल एम्फीबिया (urodele amphibia) के जन्तुओं में रुकर्ट (Ruckert) ने देखे थे जो 1mm तक लम्बे होते हैं। लैंप बुश गुणसूत्र प्रथम अर्धसूत्री विभाजन (first meiosis) की दीर्घ डिप्लोटीन (prolonged diplotene) अवस्था में पाए जाते हैं।
विशेष प्रकार के गुणसूत्र
(Special Types of Chromosomes)
[1] लार ग्रन्थि गुणसूत्र (Salivary gland chromosome)
[II] लैंपब्रुश गुणसूत्र (Lampbrush chromosome)
2. न्यूक्लिक अम्ल (Nucleic Acids)
खोजकर्ता एवं नामकरणकर्ता
- खोज (Discovery): फ्रेडरिक मिशर (Friedrich Miescher, 1869) ने मवाद की कोशिकाओं (Pus cells) के केंद्रक से इन्हें खोजा था और इन्हें "न्यूक्लिन" (Nuclein) नाम दिया था।
- नामकरण (Terminologist): अल्टमैन (Altmann, 1889) ने इनकी अम्लीय प्रकृति के कारण इन्हें "न्यूक्लिक एसिड" (Nucleic Acid) कहा।
- कोसेल (Kossel, 1893) ने न्यूक्लिक अम्ल का विखण्डन कर चार प्रकार के नाइट्रोजनीय क्षार (nitrogenous bases), फॉस्फोरिक अम्ल तथा कुछ कार्बोहाइड्रेट्स प्राप्त किये। उन्होंने दो प्यूरीन (purine) क्षार ऐडीनीन (adenine) व ग्वानीन (guanine) तथा दो पाइरिमिडीन (pyrimidine) क्षार साइटोसीन (cytosine) एवं थाइमीन (thymine) का थाइमस ग्रन्थि की कोशिकाओं के केन्द्रक में पता लगाया।
- इसी प्रकार यीस्ट (yeast) कोशिकाओं में उन्होंने एक अन्य न्यूक्लिक अम्ल का अध्ययन किया तथा इसमें थाइमीन क्षार के स्थान पर यूरेसिल (uracil) नामक पाइरिमिडीन क्षार की खोज की। इस खोज के लिए कोसेल (Kossel) को नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize, 1910) प्रदान किया गया।
- लेवीन (Levene, 1909) ने यीस्ट कोशिका के न्यूक्लिक अम्ल में पंचकार्बनीय शर्करा (pentose sugar) राइबोस (ribose) की खोज की तथा 1929 में उन्होंने केन्द्रक के न्यूक्लिक अम्ल में विद्यमान शर्करा का डीऑक्सीराइबोस (deoxyribose) नाम दिया क्योंकि इसके एक अणु में ऑक्सीजन का एक परमाणु कम होता है।
- इन खोजों के आधार पर केन्द्रकीय कोशिकाओं में दो प्रकार के न्यूक्लिक अम्ल - डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक (deoxyribonucleic acid- DNA) तथा राइबोन्यूक्लिक अम्ल (ribonucleic acid- RNA) की उपस्थिति स्पष्ट हो गयी। साथ ही यह भी स्पष्ट हो गया कि DNA मुख्यतः केन्द्रक में पाया जाता है जबकि RNA कोशिकाओं के साइटोसॉल (cytosol) में होता है।
- द्विकुंडलिनी मॉडल (Double Helix Model): वाटसन और क्रिक (Watson & Crick, 1953) ने रॉसलीन फ्रैंकलिन (Rosalind Franklin) और मौरिस विल्किंस के एक्स-रे विवर्तन (X-ray diffraction) डेटा के आधार पर DNA की संरचना दी (नोबेल पुरस्कार, 1962)।
- खोज (Discovery): फ्रेडरिक मिशर (Friedrich Miescher, 1869) ने मवाद की कोशिकाओं (Pus cells) के केंद्रक से इन्हें खोजा था और इन्हें "न्यूक्लिन" (Nuclein) नाम दिया था।
- नामकरण (Terminologist): अल्टमैन (Altmann, 1889) ने इनकी अम्लीय प्रकृति के कारण इन्हें "न्यूक्लिक एसिड" (Nucleic Acid) कहा।
- कोसेल (Kossel, 1893) ने न्यूक्लिक अम्ल का विखण्डन कर चार प्रकार के नाइट्रोजनीय क्षार (nitrogenous bases), फॉस्फोरिक अम्ल तथा कुछ कार्बोहाइड्रेट्स प्राप्त किये। उन्होंने दो प्यूरीन (purine) क्षार ऐडीनीन (adenine) व ग्वानीन (guanine) तथा दो पाइरिमिडीन (pyrimidine) क्षार साइटोसीन (cytosine) एवं थाइमीन (thymine) का थाइमस ग्रन्थि की कोशिकाओं के केन्द्रक में पता लगाया।
- इसी प्रकार यीस्ट (yeast) कोशिकाओं में उन्होंने एक अन्य न्यूक्लिक अम्ल का अध्ययन किया तथा इसमें थाइमीन क्षार के स्थान पर यूरेसिल (uracil) नामक पाइरिमिडीन क्षार की खोज की। इस खोज के लिए कोसेल (Kossel) को नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize, 1910) प्रदान किया गया।
- लेवीन (Levene, 1909) ने यीस्ट कोशिका के न्यूक्लिक अम्ल में पंचकार्बनीय शर्करा (pentose sugar) राइबोस (ribose) की खोज की तथा 1929 में उन्होंने केन्द्रक के न्यूक्लिक अम्ल में विद्यमान शर्करा का डीऑक्सीराइबोस (deoxyribose) नाम दिया क्योंकि इसके एक अणु में ऑक्सीजन का एक परमाणु कम होता है।
- इन खोजों के आधार पर केन्द्रकीय कोशिकाओं में दो प्रकार के न्यूक्लिक अम्ल - डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक (deoxyribonucleic acid- DNA) तथा राइबोन्यूक्लिक अम्ल (ribonucleic acid- RNA) की उपस्थिति स्पष्ट हो गयी। साथ ही यह भी स्पष्ट हो गया कि DNA मुख्यतः केन्द्रक में पाया जाता है जबकि RNA कोशिकाओं के साइटोसॉल (cytosol) में होता है।
- द्विकुंडलिनी मॉडल (Double Helix Model): वाटसन और क्रिक (Watson & Crick, 1953) ने रॉसलीन फ्रैंकलिन (Rosalind Franklin) और मौरिस विल्किंस के एक्स-रे विवर्तन (X-ray diffraction) डेटा के आधार पर DNA की संरचना दी (नोबेल पुरस्कार, 1962)।
रासायनिक घटक और सूत्र
- न्यूक्लियोटाइड का रासायनिक सूत्र (सामान्य ढांचा):
पेन्टोज़ शर्करा + नाइट्रोजनी क्षारक + फॉस्फेट समूह $(PO_4^{3-})$ - पेन्टोज़ शर्करा (Pentose Sugars):
- राइबोज़ (RNA के लिए): $C_5H_{10}O_5$
- डीऑक्सीराइबोज़ (DNA के लिए): $C_5H_{10}O_4$ (इसमें $C_2'$ पर ऑक्सीजन परमाणु कम होता है)।
- नाइट्रोजनी क्षारक (Nitrogenous Bases):
- प्यूरिन (Purines - डबल रिंग): एडेनिन (A) ($C_5H_5N_5$) और ग्वानिन (G) ($C_5H_5N_5O$)
- पिरिमिडिन (Pyrimidines - सिंगल रिंग): साइटोसिन (C) ($C_4H_5N_3O$), थाइमिन (T) ($C_5H_6N_2O_2$), यूरेसिल (U) ($C_4H_4N_2O_2$)
A = T या A = UC ≡ G
- न्यूक्लियोटाइड का रासायनिक सूत्र (सामान्य ढांचा):पेन्टोज़ शर्करा + नाइट्रोजनी क्षारक + फॉस्फेट समूह $(PO_4^{3-})$
- पेन्टोज़ शर्करा (Pentose Sugars):
- राइबोज़ (RNA के लिए): $C_5H_{10}O_5$
- डीऑक्सीराइबोज़ (DNA के लिए): $C_5H_{10}O_4$ (इसमें $C_2'$ पर ऑक्सीजन परमाणु कम होता है)।
- नाइट्रोजनी क्षारक (Nitrogenous Bases):
- प्यूरिन (Purines - डबल रिंग): एडेनिन (A) ($C_5H_5N_5$) और ग्वानिन (G) ($C_5H_5N_5O$)
- पिरिमिडिन (Pyrimidines - सिंगल रिंग): साइटोसिन (C) ($C_4H_5N_3O$), थाइमिन (T) ($C_5H_6N_2O_2$), यूरेसिल (U) ($C_4H_4N_2O_2$)
आबंध - 1. ग्लाइकोसाइडिक आबंध
रासायनिक संगठन
- बंध (Bond): शर्करा और नाइट्रोजनी क्षारक के बीच N-ग्लाइकोसिडिक बंध (N-glycosidic bond) पाया जाता है।
- उदाहरण:
- एडेनिन + शर्करा = एडिनोसिन (Adenosine)
- ग्वानिन + शर्करा = ग्वानोसिन (Guanosine)
- थाइमिन + शर्करा = थाइमिडिन (Thymidine)
2. न्यूक्लियोटाइड (Nucleotide)
परिभाषा
रासायनिक संगठन
- बंध (Bond): शर्करा के $5'$ कार्बन और फॉस्फेट समूह के बीच फॉस्फो डाई एस्टर बंध (Phosphodiester bond) होता है।
- महत्व: न्यूक्लियोटाइड्स ही DNA और RNA के बहुलक (Polymers) बनाते हैं। इसके अलावा, ऊर्जा की मुद्रा (ATP - Adenosine Triphosphate) भी एक प्रकार का न्यूक्लियोटाइड ही है।
मुख्य अंतर सारणी (Quick Comparison)
| विशेषता / गुण | न्यूक्लियोसाइड (Nucleoside) | न्यूक्लियोटाइड (Nucleotide) |
| घटक | शर्करा + नाइट्रोजनी क्षारक | शर्करा + नाइट्रोजनी क्षारक + फॉस्फेट समूह |
| फॉस्फेट समूह | अनुपस्थित (Absent) | उपस्थित (Present) |
| मुख्य कार्य | न्यूक्लियोटाइड्स का पूर्ववर्ती (Precursor) | DNA, RNA और ऊर्जा (जैसे ATP) का निर्माण करना |
| अम्लीय प्रकृति | यह कम अम्लीय होता है | यह अत्यधिक अम्लीय (Acidic) होता है (फॉस्फेट के कारण) |
चारगाफ का नियम(Chargaff's rule)
RNA (Ribose nucleic Acid):
1. mRNA (Messenger RNA): संदेशवाहक (कुल RNA का ~3-5%)।
- यह सबसे अस्थाई RNA है | इसका संश्लेषण केन्द्रक में होता है | यह डीएनए से सूचना राइबोसोम में लाता है |
2. tRNA (Transfer RNA): स्थानांतरण/एमीनो अम्ल वाहक (कुल RNA का ~10-15%)।
- इसे एडोप्टर या विलेयशील RNA भी कहते है | इसकी संरचना क्लोवर पादप की पत्ती के समान होती है | इसका संश्लेषण भी केन्द्रक में होता है | यह अमीनो अम्लों को कोशिका द्रव्य से राइबोसोम में आता है |
3. rRNA (Ribosomal RNA): राइबोसोम का निर्माण (कुल RNA का ~80% - सबसे स्थिर और प्रचुर)।- इसका संश्लेषण केंद्रिका में होता है | यह प्रोटीन संश्लेषण का कार्य करता है |
RNA (Ribose nucleic Acid):
1. mRNA (Messenger RNA): संदेशवाहक (कुल RNA का ~3-5%)।- यह सबसे अस्थाई RNA है | इसका संश्लेषण केन्द्रक में होता है | यह डीएनए से सूचना राइबोसोम में लाता है |
DNA प्रतिकृति (DNA Replication) से जुड़े प्रमुख एंजाइम
DNA प्रतिकृति वह प्रक्रिया है जिसमें एक DNA अणु से दो समान DNA प्रतियां बनती हैं। इसमें निम्नलिखित एंजाइम कार्य करते हैं:
1. हैलिकेज (Helicase / Unwindase):
कार्य: यह DNA की दोनों कुंडलियों (Strands) के बीच के हाइड्रोजन बंधों को तोड़कर उन्हें अलग (Unwind) करता है, जिससे 'प्रतिकृति कांटा' (Replication Fork) बनता है।
2. टोपोइमरेज़ / गाइरेज़ (Topoisomerase / DNA Gyrase):
कार्य: DNA के खुलने से उस पर जो मरोड़ (Tension या Supercoiling) पैदा होती है, उसे दूर करने के लिए यह DNA रज्जुक को काटकर फिर से जोड़ता है (Prokaryotes में इसे DNA गाइरेज़ कहते हैं)।
3. सिंगल-स्ट्रैंड बाइंडिंग प्रोटीन्स (SSBs):
कार्य: यह अलग हो चुके एकल DNA रज्जुकों को दोबारा आपस में जुड़ने से रोकता है (तकनीकी रूप से यह प्रोटीन है, किंतु प्रक्रिया में एंजाइम की तरह अनिवार्य है)।
4. प्राइमेज (Primase):
कार्य: यह एक प्रकार का RNA पॉलिमेरेज़ है जो DNA रज्जुक पर एक छोटा सा RNA प्राइमर (RNA Primer) जोड़ता है। DNA पॉलिमेरेज़ सीधे नया DNA बनाना शुरू नहीं कर सकता, उसे शुरुआत के लिए यह प्राइमर चाहिए होता है।
5. DNA पॉलिमेरेज़ III (DNA Polymerase III - मुख्य प्रतिकृति एंजाइम):
कार्य: यह $5' \rightarrow 3'$ दिशा में नए न्यूक्लियोटाइड्स को जोड़कर मुख्य DNA श्रृंखला का निर्माण करता है। इसमें 'प्रूफरीडिंग' (Proofreading) या गलती सुधारने की क्षमता ($3' \rightarrow 5'$ एक्सोनाuclease गतिविधि) भी होती है।
6. DNA पॉलिमेरेज़ I (DNA Polymerase I):
कार्य: यह बीच में बचे हुए RNA प्राइमर्स को हटाकर उनकी जगह DNA न्यूक्लियोटाइड्स भरता है (इसे 'निक ट्रांसलेशन' भी कहते हैं)।
7. DNA लाइगेज़ (DNA Ligase):
कार्य: यह ओकाजाकी खंडों (Okazaki fragments) और DNA के कटे हुए सिरों के बीच फॉस्फोडाईस्टर बंध बनाकर उन्हें आपस में मजबूती से जोड़ता है (इसे DNA का 'ग्लू' या फेविकोल भी कहा जाता है)।
DNA प्रतिकृति वह प्रक्रिया है जिसमें एक DNA अणु से दो समान DNA प्रतियां बनती हैं। इसमें निम्नलिखित एंजाइम कार्य करते हैं:
1. हैलिकेज (Helicase / Unwindase):
कार्य: यह DNA की दोनों कुंडलियों (Strands) के बीच के हाइड्रोजन बंधों को तोड़कर उन्हें अलग (Unwind) करता है, जिससे 'प्रतिकृति कांटा' (Replication Fork) बनता है।
2. टोपोइमरेज़ / गाइरेज़ (Topoisomerase / DNA Gyrase):
कार्य: DNA के खुलने से उस पर जो मरोड़ (Tension या Supercoiling) पैदा होती है, उसे दूर करने के लिए यह DNA रज्जुक को काटकर फिर से जोड़ता है (Prokaryotes में इसे DNA गाइरेज़ कहते हैं)।
3. सिंगल-स्ट्रैंड बाइंडिंग प्रोटीन्स (SSBs):
कार्य: यह अलग हो चुके एकल DNA रज्जुकों को दोबारा आपस में जुड़ने से रोकता है (तकनीकी रूप से यह प्रोटीन है, किंतु प्रक्रिया में एंजाइम की तरह अनिवार्य है)।
4. प्राइमेज (Primase):
कार्य: यह एक प्रकार का RNA पॉलिमेरेज़ है जो DNA रज्जुक पर एक छोटा सा RNA प्राइमर (RNA Primer) जोड़ता है। DNA पॉलिमेरेज़ सीधे नया DNA बनाना शुरू नहीं कर सकता, उसे शुरुआत के लिए यह प्राइमर चाहिए होता है।
5. DNA पॉलिमेरेज़ III (DNA Polymerase III - मुख्य प्रतिकृति एंजाइम):
कार्य: यह $5' \rightarrow 3'$ दिशा में नए न्यूक्लियोटाइड्स को जोड़कर मुख्य DNA श्रृंखला का निर्माण करता है। इसमें 'प्रूफरीडिंग' (Proofreading) या गलती सुधारने की क्षमता ($3' \rightarrow 5'$ एक्सोनाuclease गतिविधि) भी होती है।
6. DNA पॉलिमेरेज़ I (DNA Polymerase I):
कार्य: यह बीच में बचे हुए RNA प्राइमर्स को हटाकर उनकी जगह DNA न्यूक्लियोटाइड्स भरता है (इसे 'निक ट्रांसलेशन' भी कहते हैं)।
7. DNA लाइगेज़ (DNA Ligase):
कार्य: यह ओकाजाकी खंडों (Okazaki fragments) और DNA के कटे हुए सिरों के बीच फॉस्फोडाईस्टर बंध बनाकर उन्हें आपस में मजबूती से जोड़ता है (इसे DNA का 'ग्लू' या फेविकोल भी कहा जाता है)।
2. DNA मरम्मत और पुनर्संयोजन (DNA Repair & Recombination) से जुड़े एंजाइम
1. एंडोन्यूक्लिऐज (Endonucleases):
कार्य: यह DNA श्रृंखला के बीच से न्यूक्लियोटाइड्स के बंधों को काटता है (क्षतिग्रस्त DNA को हटाने के लिए)।
2. एक्सोन्यूक्लिऐज (Exonucleases):
कार्य: यह DNA के सिरों (Ends) से न्यूक्लियोटाइड्स को अलग करता है।
3. डीएनए ग्लाइकोसिलेज (DNA Glycosylase):
कार्य: यह क्षतिग्रस्त या उत्परिवर्तित (Mutated) नाइट्रोजनी क्षारक को शर्करा-फॉस्फेट रीढ़ से अलग करता है (Base Excision Repair में सहायक)।
4. रीकॉम्बिनेज़ (Recombinases - जैसे RecA या Rad51):
कार्य: यह आनुवंशिक पुनर्संयोजन (Genetic Recombination) और समजात पुनर्संयोजन (Homologous Recombination) के दौरान DNA रज्जुकों के आदान-प्रदान में मदद करता है।
1. एंडोन्यूक्लिऐज (Endonucleases):
कार्य: यह DNA श्रृंखला के बीच से न्यूक्लियोटाइड्स के बंधों को काटता है (क्षतिग्रस्त DNA को हटाने के लिए)।
2. एक्सोन्यूक्लिऐज (Exonucleases):
कार्य: यह DNA के सिरों (Ends) से न्यूक्लियोटाइड्स को अलग करता है।
3. डीएनए ग्लाइकोसिलेज (DNA Glycosylase):
कार्य: यह क्षतिग्रस्त या उत्परिवर्तित (Mutated) नाइट्रोजनी क्षारक को शर्करा-फॉस्फेट रीढ़ से अलग करता है (Base Excision Repair में सहायक)।
4. रीकॉम्बिनेज़ (Recombinases - जैसे RecA या Rad51):
कार्य: यह आनुवंशिक पुनर्संयोजन (Genetic Recombination) और समजात पुनर्संयोजन (Homologous Recombination) के दौरान DNA रज्जुकों के आदान-प्रदान में मदद करता है।
3. अनुलेखन (Transcription - DNA से RNA बनना) से जुड़ा मुख्य एंजाइम
RNA पॉलिमेरेज़ (RNA Polymerase):
कार्य: यह DNA के एक टेंपलेट रज्जुक को पढ़कर उसके पूरक RNA (mRNA, tRNA, rRNA) का निर्माण करता है।
प्रकार (यूकेरियोट्स में):
RNA Polymerase I: rRNA (राइबोसोमल RNA) का संश्लेषण करता है।
RNA Polymerase II: mRNA (मैसेसेंजर RNA) और hnRNA का संश्लेषण करता है।
RNA Polymerase III: tRNA और 5S rRNA का संश्लेषण करता है।
RNA पॉलिमेरेज़ (RNA Polymerase):
कार्य: यह DNA के एक टेंपलेट रज्जुक को पढ़कर उसके पूरक RNA (mRNA, tRNA, rRNA) का निर्माण करता है।
प्रकार (यूकेरियोट्स में):
RNA Polymerase I: rRNA (राइबोसोमल RNA) का संश्लेषण करता है।
RNA Polymerase II: mRNA (मैसेसेंजर RNA) और hnRNA का संश्लेषण करता है।
RNA Polymerase III: tRNA और 5S rRNA का संश्लेषण करता है।
4. जैव-प्रौद्योगिकी (Biotechnology) में उपयोग होने वाले महत्वपूर्ण DNA एंजाइम
1. रिस्ट्रिक्शन एंडोन्यूक्लिऐज (Restriction Endonuclease - "Molecular Scissors"):
कार्य: यह DNA अणु को विशिष्ट पहचान स्थलों (Palindromic sequences) पर काटता है (जैसे EcoRI)।
2. रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेज (Reverse Transcriptase):
कार्य: यह RNA टेंपलेट का उपयोग करके पूरक DNA (cDNA) का निर्माण करता है (रेट्रोवाइरस और जीन क्लोनिंग में प्रयुक्त)।
3. टर्मीनल डीऑक्सीन्यूक्लियोटाइडल ट्रांसफरेड (Terminal Transferase):
कार्य: यह DNA के $3'$ सिरे पर न्यूक्लियोटाइड्स जोड़ता है।
1. रिस्ट्रिक्शन एंडोन्यूक्लिऐज (Restriction Endonuclease - "Molecular Scissors"):
कार्य: यह DNA अणु को विशिष्ट पहचान स्थलों (Palindromic sequences) पर काटता है (जैसे EcoRI)।
2. रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेज (Reverse Transcriptase):
कार्य: यह RNA टेंपलेट का उपयोग करके पूरक DNA (cDNA) का निर्माण करता है (रेट्रोवाइरस और जीन क्लोनिंग में प्रयुक्त)।
3. टर्मीनल डीऑक्सीन्यूक्लियोटाइडल ट्रांसफरेड (Terminal Transferase):
कार्य: यह DNA के $3'$ सिरे पर न्यूक्लियोटाइड्स जोड़ता है।
प्रोटीन संश्लेषण का केंद्रीय सिद्धांत
(Central Dogma of Molecular Biology)
- प्रतिपादन: फ्रांसिस क्रिक (Francis Crick, 1958)।
- रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन की खोज: हॉवर्ड टेमिन (Howard Temin) और डेविड बाल्टीमोर (David Baltimore, 1970) ने रेट्रोवाइरस (जैसे HIV) में इसकी खोज की, जिसके लिए उन्हें 1975 का नोबेल पुरस्कार मिला।
- प्रतिपादन: फ्रांसिस क्रिक (Francis Crick, 1958)।
- रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन की खोज: हॉवर्ड टेमिन (Howard Temin) और डेविड बाल्टीमोर (David Baltimore, 1970) ने रेट्रोवाइरस (जैसे HIV) में इसकी खोज की, जिसके लिए उन्हें 1975 का नोबेल पुरस्कार मिला।
दिशा एवं रासायनिक प्रवाह
$$\text{DNA} \xrightarrow{\text{Transcription }} \text{mRNA} \xrightarrow{\text{Translation }} \text{Polypeptide (Protein)}$$(रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन: $\text{RNA} \xrightarrow{\text{Reverse Transcriptase}} \text{DNA}$)
मुख्य चरण और जैव-रासायनिक घटक
अनुलेखन (Transcription): केंद्रक में RNA पॉलिमेरेज़ एंजाइम द्वारा DNA के टेंपलेट रज्जुक ($3' \rightarrow 5'$) से पूरक mRNA ($5' \rightarrow 3'$) का निर्माण।
आनुवंशिक कूट (Genetic Code):
- हरबगोविंद खुराना, मार्शल नीरेनबर्ग और मथाई ने आनुवंशिक कूट की डिकोडिंग की।
- कुल 64 कोडॉन होते हैं (61 अमीनो अम्लों के लिए और 3 स्टॉप कोडॉन: UAA, UAG, UGA)।
- प्रारंभिक कोडॉन: AUG (यह मेथियोनीन अमीनो अम्ल को कोड करता है)।
- अनुवाद (Translation): कोशिका द्रव्य में राइबोसोम और tRNA द्वारा mRNA के कोडॉनों को अमीनो अम्लों की पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला (पेप्टाइड बंध: $-CO-NH-$ द्वारा जुड़े) में बदलना।
आनुवंशिक कूट (Genetic Code):
- हरबगोविंद खुराना, मार्शल नीरेनबर्ग और मथाई ने आनुवंशिक कूट की डिकोडिंग की।
- कुल 64 कोडॉन होते हैं (61 अमीनो अम्लों के लिए और 3 स्टॉप कोडॉन: UAA, UAG, UGA)।
- प्रारंभिक कोडॉन: AUG (यह मेथियोनीन अमीनो अम्ल को कोड करता है)।
- अनुवाद (Translation): कोशिका द्रव्य में राइबोसोम और tRNA द्वारा mRNA के कोडॉनों को अमीनो अम्लों की पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला (पेप्टाइड बंध: $-CO-NH-$ द्वारा जुड़े) में बदलना।
मनुष्य में लिंग निर्धारण
(Sex Determination in Humans)
खोजकर्ता एवं नामकरणकर्ता
- एक्स-गुणसूत्र (X-Chromosome) की खोज: क्लैंसन (Henking, 1891) ने की थी और इसे 'X-बॉडी' नाम दिया था। मैक्लंघ (McClung, 1902) ने इसे लिंग निर्धारण से जोड़ा।
- वाई-गुणसूत्र (Y-Chromosome) की खोज: नेटी स्टीवंस (Nettie Stevens, 1905) और एडमंड विल्सन (Edmund Wilson) ने की थी।
- वाई गुणसूत्र पर SRY जीन की खोज: पीटर गुडफेलो (Peter Goodfellow) और डेविड पेज (David Page, 1990 के दशक में)।
- एक्स-गुणसूत्र (X-Chromosome) की खोज: क्लैंसन (Henking, 1891) ने की थी और इसे 'X-बॉडी' नाम दिया था। मैक्लंघ (McClung, 1902) ने इसे लिंग निर्धारण से जोड़ा।
- वाई-गुणसूत्र (Y-Chromosome) की खोज: नेटी स्टीवंस (Nettie Stevens, 1905) और एडमंड विल्सन (Edmund Wilson) ने की थी।
- वाई गुणसूत्र पर SRY जीन की खोज: पीटर गुडफेलो (Peter Goodfellow) और डेविड पेज (David Page, 1990 के दशक में)।
प्रकार एवं क्रियाविधि
- मनुष्य में $XX-XY$ प्रकार का लिंग निर्धारण पाया जाता है।
- गुणसूत्रों का कुल सेट (Karyotype): $44 + XX$ (मादा) और $44 + XY$ (नर)।
- युग्मकों का निर्माण:
- मादा (Homogametic): सभी अंडणु (Ovum) में समान गुणसूत्र होते हैं $\rightarrow (22 + X)$।
- नर (Heterogametic): शुक्राणु (Sperms) दो प्रकार के बनते हैं $\rightarrow$ 50% ($22 + X$) और 50% ($22 + Y$)।
- निषेचन परिणाम:
- (22 + X) [अंडणु] + (22 + X) [शुक्राणु] $\rightarrow$ 44 + XX (लड़की)
- (22 + X) [अंडणु] + (22 + Y) [शुक्राणु] $\rightarrow$ 44 + XY (लड़का)
- मनुष्य में $XX-XY$ प्रकार का लिंग निर्धारण पाया जाता है।
- गुणसूत्रों का कुल सेट (Karyotype): $44 + XX$ (मादा) और $44 + XY$ (नर)।
- युग्मकों का निर्माण:
- मादा (Homogametic): सभी अंडणु (Ovum) में समान गुणसूत्र होते हैं $\rightarrow (22 + X)$।
- नर (Heterogametic): शुक्राणु (Sperms) दो प्रकार के बनते हैं $\rightarrow$ 50% ($22 + X$) और 50% ($22 + Y$)।
- निषेचन परिणाम:
- (22 + X) [अंडणु] + (22 + X) [शुक्राणु] $\rightarrow$ 44 + XX (लड़की)
- (22 + X) [अंडणु] + (22 + Y) [शुक्राणु] $\rightarrow$ 44 + XY (लड़का)

