रक्त परिसंचरण तंत्र (Blood Circulatory System)

 

रक्त परिसंचरण तंत्र 

(Blood Circulatory System)

परिचय (Introduction)

  • जीवों के शरीर में आवश्यक पदार्थों (जैसे ऑक्सीजन, पोषक तत्व, हार्मोन आदि) को विभिन्न अंगों तक पहुँचाने और अपशिष्ट पदार्थों (जैसे कार्बन डाइऑक्साइड) को बाहर निकालने वाले तंत्र को रक्त परिसंचरण तंत्र कहते हैं।

  • मानव शरीर में मुख्य रूप से बंद परिसंचरण तंत्र (Closed Circulatory System) पाया जाता है, यानी रक्त हमेशा बंद नलिकाओं (धमनियों और शिराओं) के अंदर बहता है।

  • मानव शरीर में इसकी खोज विलियम हार्वे (William Harvey) ने 1628 में की थी।

रक्त परिसंचरण तंत्र (Blood Circulatory System) को मुख्य रूप से दो आधारों पर बांटा गया है: पहला, शरीर में रक्त के बहने के तरीके के आधार पर; और दूसरा, कशेरुकी (Vertebrate) जीवों के हृदय से रक्त गुजरने के चक्र के आधार पर।

इनके प्रकारों का विस्तृत विवरण नीचे दिया गया है:

1. रक्त के प्रवाह के आधार पर प्रकार (Types based on Flow)


(क) खुला परिसंचरण तंत्र (Open Circulatory System)


  • विशेषता: इसमें रक्त बिना किसी बंद नलिकाओं (धमनियों या शिराओं) के सीधे शरीर के खाली स्थानों या गुहाओं में बहता है, जिन्हें हिमोसील (Hemocoel) कहते हैं।

  • इसमें अंग सीधे रक्त (या हीमोलिम्फ) में डूबे रहते हैं।

  • उदाहरण: आर्थोपोडा संघ के जीव (जैसे कॉकरोच, कीट, केकड़ा) और मोलस्का संघ के कुछ जीव।

(ख) बंद परिसंचरण तंत्र (Closed Circulatory System)


  • विशेषता: इसमें रक्त हमेशा बंद और फैलने-सिकुड़ने वाली नलिकाओं (धमनियों, शिराओं और केशिकाओं) के जाल के अंदर ही बहता है। रक्त कभी भी सीधे अंगों के संपर्क में नहीं आता।

  • उदाहरण: सभी कशेरुकी जीव (मानव, स्तनधारी, पक्षी, मछली, उभयचर) और केंचुआ (Annelida)।

2. हृदय के चक्र के आधार पर प्रकार (Types in Vertebrates)


कशेरुकी जीवों में हृदय की बनावट के आधार पर परिसंचरण मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है:

(क) एकल परिसंचरण (Single Circulation)


  • विशेषता: इसमें रक्त एक पूरे चक्र (Circuit) के दौरान हृदय से केवल एक बार गुजरता है। मछली का हृदय अशुद्ध रक्त को गिल्स (Gills) में भेजता है, जहाँ वह शुद्ध होकर सीधे शरीर में चला जाता है।

  • हृदय: इनका हृदय 2-कक्षीय (2-Chambered) होता है (एक अलिंद और एक निलय)।

  • उदाहरण: मछलियाँ (Fishes)।

(ख) दोहरा परिसंचरण (Double Circulation)


  • विशेषता: इसमें रक्त एक पूरा चक्कर लगाने में हृदय से दो बार गुजरता है (एक बार फेफड़ों में शुद्ध होने के लिए और दूसरी बार पूरे शरीर में संचार के लिए)।

  • यह दो प्रकार का होता है:

    1. अपूर्ण दोहरा परिसंचरण (Incomplete Double Circulation): इसमें अशुद्ध और शुद्ध रक्त थोड़ा-बहुत मिल जाता है। हृदय 3-कक्षीय होता है।

      • उदाहरण: उभयचर (जैसे मेंढक) और अधिकांश सरीसृप (जैसे छिपकली)।

    2. पूर्ण दोहरा परिसंचरण (Complete Double Circulation): इसमें शुद्ध और अशुद्ध रक्त कभी नहीं मिलते। हृदय पूरी तरह 4-कक्षीय होता है।

      • उदाहरण: पक्षी (Birds) और स्तनधारी (Mammals - जैसे मनुष्य)।

 

रक्त परिसंचरण तंत्र मुख्य घटक 

मानव परिसंचरण तंत्र मुख्य रूप से तीन चीजों से मिलकर बनता है:

  1. हृदय (Heart): यह शरीर का मुख्य पंपिंग अंग है।

  2. रक्त वाहिनियाँ (Blood Vessels): धमनियाँ (Arteries), शिराएँ (Veins) और केशिकाएँ (Capillaries)।

  3. रक्त (Blood): एक तरल संयोजी ऊतक (Fluid Connective Tissue)।


हृदय की संरचना (Structure of Heart)

मनुष्य का हृदय रूधिर को पम्प करने का कार्य करता है। यह ऊपर से चौड़ा एवं नीचे से सिकुडा होता है। यह बंद मुठ्ठी की तरह होता है। 

हृदय में चार प्रकोष्ठ पाये जाते है जिनमें दो आलिंद व दो निलय होते है। एक आलिंद व एक निलय हृदय के दायीं ओर व एक आलिंद व एक निलय हृदय के बायीं ओर स्थित होते है।

हृदय के दायें आलिंद में महाशिरा शरीर से कार्बन डाई ऑक्साइड गैस युक्त अशुद्ध रूधिर लाती है। जो दायें निलय में पहुँचने के बाद फुफ्फुसीय धमनी से होता हुआ फेफडों में पहुँच जाता है। 

फेफडों में रूधिर के पहुँचने पर फेफड़ो में स्थित कुपिका कोशिकायें रुधिर से कार्बन डाई ऑक्साइड गैस को अवशोषित कर लेती है और ऑक्सीजन गैस मिला देती है। 

इस प्रकार ऑक्सीजन युक्त रुधिर फुफ्फुसीय शिरा द्वारा हृदय के बायें आलिंद में पहुँचता है जहाँ से रूधिर बायें निलय से होता हुआ महाधमनी द्वारा पूरे शरीर में पहुँच जाता है। 

इस प्रकार हृदय में दो बार रूधिर प्रवेश करता है और दो बार बाहर निकलता है इसलिए इस प्रकार के परिसंचरण को दोहरा परिसंचरण कहते है।

  • SA Node (साइनोट्रायल नोड): इसे दिल का 'नेचुरल पेसमेकर' कहा जाता है। यह दाहिने आलिंद (Right Atrium) की ऊपरी दीवार पर होता है और खुद-ब-खुद बिजली के सिग्नल (Electrical Impulses) पैदा करता है, जिससे दिल की धड़कन शुरू होती है।

  • AV Node (एट्रियोवेंट्रिकुलर नोड): यह SA नोड से थोड़ा नीचे, आलिंद और निलय (Atria and Ventricles) के बीच में स्थित होता है। यह SA नोड से आने वाले सिग्नलों को थोड़ा सा रोकता है (ताकि आलिंद पूरी तरह खून खाली कर सकें) और फिर उन्हें आगे नीचे की तरफ भेजता है।

  • हिज का बंडल (Bundle of His): यह विशेष तंतुओं (Fibers) का एक समूह होता है जो AV नोड से सिग्नल लेकर हृदय के दोनों निलय (Ventricles) के बीच की दीवार (Septum) से होते हुए नीचे की ओर ले जाता है। यह दो शाखाओं (Right and Left branches) में बँट जाता है।

  • पुर्किन्जे तंतु (Purkinje Fibers): यह हिज के बंडल से जुड़े हुए बहुत बारीक और फैले हुए तंतु होते हैं, जो हृदय के निचले कक्षों (Ventricles) की दीवारों में चारों तरफ फैले होते हैं। ये सिग्नल को पूरी मांसपेशी में तुरंत फैला देते हैं जिससे निलय एक साथ सिकुड़ते हैं।

  • जब दिल धड़कता है, तो विद्युत तरंग (Electrical Impulse) हमेशा एक निश्चित रास्ते से गुजरती है:
$$\text{SA Node} \rightarrow \text{AV Node} \rightarrow \text{Bundle of His } \rightarrow \text{Purkinje Fibers }$$

प्रक्रिया:

  1. सबसे पहले SA Node करंट पैदा करता है, जिससे दोनों ऊपरी कक्ष (Atria) सिकुड़ते हैं और खून नीचे जाता है।

  2. यह सिग्नल AV Node तक पहुँचता है।

  3. AV नोड से सिग्नल Bundle of His में जाता है जो इसे दिल के निचले हिस्से की तरफ ले जाता है।

  4. अंत में, Purkinje Fibers इस करंट को पूरे निचले हिस्से (Ventricles) में फैला देते हैं जिससे वे तेजी से सिकुड़ते हैं और शरीर व फेफड़ों में खून पंप होता है।




मानव का हृदय एक मिनट में 72 बार धड़कता है। एक सैकेण्ड में 1.2 बार धड़कता है। और एक बार धडकने में 0.83 सैकेण्ड़ का समय लेता है।

हृदय की धड़कन को स्टेथोस्कॉप के द्वारा मापा जाता है। यह ध्वनि के परावर्तन के सिद्धांत पर कार्य करता है।



रक्त वाहिनियों के प्रकार (Types of Blood Vessels)

मानव शरीर में रक्त वाहिनियाँ (Blood Vessels) वे बंद नलिकाएँ होती हैं जिनके माध्यम से पूरे शरीर में रक्त का संचार (परिसंचरण) होता है।

रक्त वाहिनियाँ मुख्य रूप से तीन प्रकार की होती हैं:

1. धमनियाँ (Arteries)


  • कार्य: धमनियाँ हृदय से शुद्ध रक्त (Oxygenated Blood - जिसमें ऑक्सीजन की मात्रा अधिक होती है) को लेकर शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुँचाती हैं।

  • अपवाद: फुफ्फुसीय धमनी (Pulmonary Artery) इसका अपवाद है, जो हृदय से अशुद्ध रक्त को फेफड़ों तक ले जाती है।

  • मुख्य विशेषताएँ:

    • इनकी दीवारें (Walls) मोटी, लचीली और पेशीय होती हैं, क्योंकि यहाँ रक्त का दबाव (Blood Pressure) बहुत अधिक होता है।

    • इनमें रक्त तेज गति से बहता है।

    • इनमें कपाट (Valves) नहीं पाए जाते, क्योंकि दबाव इतना ज्यादा होता है कि रक्त अपने आप आगे बढ़ता रहता है।

    • ये आमतौर पर शरीर की गहराई में स्थित होती हैं (त्वचा के नीचे कम दिखाई देती हैं)।

मानव शरीर के प्रमुख अंगों को रक्त पहुँचाने वाली प्रमुख धमनियों (Arteries) के नाम निम्नलिखित हैं:

  • यकृत (Liver): हेपेटिक धमनी (Hepatic Artery) — यह यकृत को ऑक्सीजनयुक्त रक्त पहुँचाती है।

  • हृदय (Heart): कोरोनरी धमनी (Coronary Artery) — यह हृदय की खुद की मांसपेशियों को रक्त सप्लाई करती है।

  • मस्तिष्क (Brain): कैरोटिड धमनी (Carotid Artery) और वर्टीब्रल धमनी (Vertebral Artery) — ये मस्तिष्क और सिर के अन्य हिस्सों को रक्त पहुँचाती हैं।

  • वृक्क / गुर्दे (Kidneys): वृक्क धमनी (Renal Artery) — यह महाधमनी से शुद्ध रक्त को छानने के लिए गुर्दों तक लाती है।

  • फेफड़े (Lungs): फुफ्फुसीय धमनी (Pulmonary Artery) — यह हृदय से अशुद्ध रक्त को फेफड़ों में ऑक्सीजन के लिए ले जाती है। (ध्यान दें: फेफड़े के खुद के ऊतकों को पोषण ब्रोंकियल धमनी (Bronchial Artery) द्वारा मिलता है)।

  • आमाशय (Stomach): गैस्ट्रिक धमनी (Gastric Artery) — यह आमाशय (पेट) को रक्त सप्लाई करती है।

  • आंत्र / आंत (Intestines): मेसेंट्रिक धमनी (Mesenteric Artery) — इसके अंतर्गत सुपीरियर और इंफीरियर मेसेंट्रिक धमनियां आती हैं, जो छोटी और बड़ी आंत को रक्त पहुँचाती हैं।


2. शिराएँ (Veins)


  • कार्य: शिराएँ शरीर के विभिन्न अंगों से अशुद्ध रक्त (Deoxygenated Blood - जिसमें कार्बन डाइऑक्साइड होती है) को एकत्र करके वापस हृदय तक लाती हैं।

  • अपवाद: फुफ्फुसीय शिरा (Pulmonary Vein) इसका अपवाद है, जो फेफड़ों से शुद्ध रक्त को वापस हृदय में लाती है।

  • मुख्य विशेषताएँ:

    • इनकी दीवारें धमनियों की तुलना में पतली और कम लचीली होती हैं।

    • इनमें रक्त का दबाव कम होता है।

    • इनमें कपाट (Valves) पाए जाते हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि रक्त केवल हृदय की दिशा में बहे और गुरुत्वाकर्षण के कारण नीचे की तरफ या उल्टा न लौटे।

    • ये त्वचा के ठीक नीचे नीले या हरे रंग की नसों के रूप में स्पष्ट दिखाई देती हैं।

3. केशिकाएँ (Capillaries)


  • कार्य: यह धमनियों और शिराओं को आपस में जोड़ने वाली अत्यंत सूक्ष्म और पतली नलिकाओं का जाल होती हैं।

  • मुख्य विशेषताएँ:

    • इनकी दीवारें केवल एक कोशिका (Single-cell layer) जितनी पतली होती हैं।

    • यहीं पर मुख्य आदान-प्रदान (Exchange) होता है—रक्त से ऑक्सीजन और पोषक तत्व शरीर की कोशिकाओं में जाते हैं, और कोशिकाओं से कार्बन डाइऑक्साइड व अपशिष्ट पदार्थ वापस रक्त में आते हैं।

संक्षिप्त तुलना तालिका (Quick Summary Table)


विशेषताधमनी (Artery)शिरा (Vein)केशिका (Capillary)
रक्त का प्रकारशुद्ध रक्त (ऑक्सीजन युक्त)*अशुद्ध रक्त (कार्बन डाइऑक्साइड युक्त)*गैसों और पोषक तत्वों का आदान-प्रदान
प्रवाह की दिशाहृदय से शरीर के अंगों की ओरअंगों से वापस हृदय की ओरधमनी और शिरा के बीच संपर्क
दीवार की मोटाईमोटी और मजबूतपतलीबहुत ही बारीक (एक कोशिका जितनी)
कपाट (Valves)नहीं होतेहोते हैंनहीं होते

रक्त (Blood)


परिचय एवं मुख्य विशेषताएँ (Introduction)


  • परिभाषा: रक्त एक तरल संयोजी ऊतक (Fluid Connective Tissue) है।

  • अध्ययन : रक्त का अध्ययन हेमेटोलॉजी (Hematology) कहलाता है।
  • प्रकृति: यह स्वाद में हल्का क्षारीय (Alkaline) होता है।

  • pH मान: रक्त का pH मान लगभग 7.4 होता है।

  • मात्रा: एक स्वस्थ वयस्क मानव शरीर में औसतन 5 से 6 लीटर रक्त होता है (जो कुल शरीर के वजन का लगभग 7-8% होता है)।

    रक्त के निर्माण (Blood Formation / Hemopoiesis) की प्रक्रिया मनुष्य के जीवन के अलग-अलग चरणों (अवस्थाओं) में शरीर के अलग-अलग अंगों में होती है।

    भ्रूण अवस्था में (जब बच्चा गर्भ में होता है)

    गर्भावस्था के दौरान जब भ्रूण विकसित हो रहा होता है, तब अस्थि मज्जा (Bone Marrow) पूरी तरह बनी नहीं होती, इसलिए रक्त का निर्माण अलग-अलग अंगों में होता है:

    • भ्रूण के शुरुआती सप्ताहों में (1 से 2 महीने): रक्त का निर्माण सबसे पहले योक्स सैक (Yolk Sac / पीतक थैली) में होता है।

    • भ्रूण के अगले चरणों में (3 से 9 महीने): जैसे-जैसे अंग विकसित होते हैं, रक्त का निर्माण यकृत (Liver) और प्लीहा (Spleen) में होने लगता है।

    जन्म के बाद और वयस्क अवस्था में (After Birth & in Adults)

    बच्चे के जन्म के बाद और बड़े होने पर (वयस्क अवस्था में) लाल रक्त कणिकाओं (RBC), श्वेत रक्त कणिकाओं (WBC) और प्लेटलेट्स का निर्माण मुख्य रूप से अस्थि मज्जा (Bone Marrow) में होता है।

    • मुख्य स्थान: हड्डियों के अंदर पाए जाने वाले स्पंजी ऊतक यानी लाल अस्थि मज्जा (Red Bone Marrow) में रक्त का उत्पादन होता है। (विशेष तौर पर चपटी हड्डियों जैसे पसलियों, उरोस्थि/Sternum, रीढ़ की हड्डी और श्रोणि मेखला / Pelvic bones में)।

    • विशेष नोट: बच्चों में लगभग सभी हड्डियों के मज्जा में रक्त बनता है, लेकिन वयस्क होने पर लंबी हड्डियों के बीच का हिस्सा पीले मज्जा (Yellow Bone Marrow) में बदल जाता है, जहाँ वसा जमा होती है।

    विशेष परिस्थिति (आपातकाल में):

    यदि किसी वयस्क व्यक्ति को कोई गंभीर बीमारी हो जाए या उसकी लाल अस्थि मज्जा काम करना बंद कर दें, तो शरीर की आवश्यकता पूरी करने के लिए यकृत (Liver) और प्लीहा (Spleen) एक बार फिर से सीमित मात्रा में रक्त कोशिकाओं का निर्माण करना शुरू कर सकते हैं। इस प्रक्रिया को एक्स्ट्रा-मेडुलरी हेमटोपोइजिस (Extramedullary Hematopoiesis) कहा जाता है।


रक्त का संगठन (Composition of Blood)


रक्त मुख्य रूप से दो भागों से मिलकर बना होता है:

(क) प्लाज्मा (Plasma) — लगभग 55% भाग


  • यह रक्त का तरल (Fluid) और पीला हिस्सा होता है।

  • इसमें लगभग 90% पानी, 7% प्रोटीन, 0.9% लवण और बाकी ग्लूकोज, हार्मोन व अन्य पदार्थ होते हैं।

  • फाइब्रिनोजेन (Fibrinogen): प्लाज्मा में पाया जाने वाला यह प्रोटीन रक्त का थक्का जमाने में मदद करता है। (जब प्लाज्मा से फाइब्रिनोजेन प्रोटीन को हटा दिया जाता है, तो शेष भाग को सीरम (Serum) कहते हैं)।

(ख) रक्त कणिकाएँ (Blood Corpuscles) — लगभग 45% भाग


यह तीन प्रकार की होती हैं:

  1. RBC (लाल रक्त कणिकाएँ / Erythrocytes):

    • रंग: इनमें हीमोग्लोबिन (Hemoglobin) नामक प्रोटीन पाया जाता है, जिसके कारण रक्त का रंग लाल होता है।

    • कार्य: फेफड़ों से ऑक्सीजन को शरीर की सभी कोशिकाओं तक पहुँचाना और कार्बन डाइऑक्साइड को वापस लाना।

    • जीवनकाल: लगभग 120 दिन।

    • निर्माण: इनका निर्माण अस्थि मज्जा (Bone Marrow) में होता है। (प्लीहा या Spleen को RBC का 'कब्रिस्तान' कहा जाता है)।

  2. WBC (श्वेत रक्त कणिकाएँ / Leukocytes):

    • विशेषता: इन्हें शरीर के सैनिक (Soldiers) कहा जाता है क्योंकि ये शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (Immune System) को मजबूत रखती हैं।

    • कार्य: बाहरी रोगाणुओं (बैक्टीरिया, वायरस) और संक्रमण से लड़ना।

    • जीवनकाल: कुछ दिनों (लगभग 2 से 4 दिन) का होता है।

श्वेत रक्त कणिकाओं (WBC / Leukocytes) को उनकी कोशिका द्रव्य (Cytoplasm) में पाए जाने वाले कणों (Granules) और केंद्रक (Nucleus) की बनावट के आधार पर मुख्य रूप से दो भागों में बांटा गया है:

1. कणिका युक्त WBC (Granulocytes)


इनके कोशिका द्रव्य में छोटे-छोटे कण (Granules) पाए जाते हैं। ये कुल WBC का लगभग 60-70% हिस्सा होती हैं। ये तीन प्रकार की होती हैं:

  • (क) न्यूट्रोफिल (Neutrophils):

    • मात्रा: ये कुल WBC का सबसे बड़ा हिस्सा (लगभग 60-70%) होती हैं।

    • कार्य: ये शरीर की प्राथमिक रक्षा पंक्ति (First line of defense) हैं। जब भी शरीर पर कोई बैक्टीरिया या फंगस हमला करता है, तो ये उन्हें घेरकर खा जाती हैं (इस प्रक्रिया को फैगोसाइटोसिस / Phagocytosis कहते हैं)।

  • (ख) इयोसिनोफिल (Eosinophils):

    • मात्रा: लगभग 2-4%।

    • कार्य: ये मुख्य रूप से एलर्जी (Allergies) की प्रतिक्रिया और परजीवियों (Parasites / जैसे कीड़े-मकोड़े) के संक्रमण के समय सक्रिय होती हैं।

  • (ग) बेसोफिल (Basophils):

    • मात्रा: सबसे कम (लगभग 0.5 - 1%)।

    • कार्य: ये रक्त वाहिनियों में हिस्टामाइन (Histamine) और हेपेरिन (Heparin) जैसे रसायन छोड़ती हैं, जो सूजन (Inflammation) पैदा करने और रक्त को जमने से रोकने में मदद करते हैं।

2. कणिका-रहित WBC (Agranulocytes)


इनके कोशिका द्रव्य में कण नहीं पाए जाते और इनका केंद्रक साफ होता है। ये दो प्रकार की होती हैं:

  • (क) लिम्फोसाइट्स (Lymphocytes):

    • मात्रा: कुल WBC का लगभग 20-30% (दूसरी सबसे बड़ी संख्या)।

    • विशेषता: ये आकार में छोटी होती हैं लेकिन प्रतिरक्षा तंत्र (Immune System) के लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं।

    • मुख्य प्रकार:

      • T-Lymphocytes (T-Cells): ये सीधे संक्रमित कोशिकाओं और कैंसर कोशिकाओं पर हमला करती हैं।

      • B-Lymphocytes (B-Cells): ये विशिष्ट एंटीबॉडी (Antibodies) बनाती हैं जो वायरस और बैक्टीरिया को नष्ट करती हैं।

  • (घ) मोनोसाइट्स (Monocytes):

    • मात्रा: लगभग 2-8%।

    • विशेषता: ये आकार में सभी WBC में सबसे बड़ी होती हैं।

    • कार्य: जब ये रक्त से निकलकर ऊतकों (Tissues) में प्रवेश करती हैं, तो इन्हें मैक्रोफेज (Macrophages) कहा जाता है। ये मृत कोशिकाओं और बाहरी हानिकारक कणों को पूरी तरह साफ (भक्षण) करती हैं।

संक्षेप में याद रखने की ट्रिक:

  • सबसे ज्यादा संख्या: न्यूट्रोफिल (Neutrophils)

  • सबसे बड़े आकार की: मोनोसाइट्स (Monocytes)

  • एंटीबॉडी बनाने वाली: लिम्फोसाइट्स (Lymphocytes)

 

3.             Platelets (प्लेटलेट्स / Thrombocytes):

  • विशेषता: ये आकार में बहुत छोटे और केंद्रक-रहित (Anucleated) कण होते हैं।

  • कार्य: शरीर में कहीं चोट लगने या कटने पर रक्त का थक्का (Blood Clotting) जमाने में मदद करना ताकि अधिक खून न बहे।


रक्त के मुख्य कार्य (Functions of Blood)


  • गैसों का परिवहन: फेफड़ों से ऑक्सीजन (O₂) को ऊतकों तक और ऊतकों से कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) को फेफड़ों तक ले जाना।

  • पोषक तत्वों का वितरण: पचे हुए भोजन (ग्लूकोज, विटामिन, अमीनो एसिड) को शरीर के हर हिस्से तक पहुँचाना।

  • तापमान नियंत्रण: शरीर के आंतरिक तापमान को संतुलित (Maintain) रखना।

  • उत्सर्जन: शरीर के जहरीले और अपशिष्ट पदार्थों को किडनी या यकृत तक पहुँचाना ताकि उन्हें बाहर निकाला जा सके।

  • सुरक्षा: WBC और प्लेटलेट्स के माध्यम से रोगों से बचाना और घाव भरना।

रक्त समूह (Blood Groups)

  • खोजकर्ता: रक्त समूहों (Blood Groups) की खोज का श्रेय आस्ट्रिया के महान वैज्ञानिक कार्ल लैंडस्टीनर (Karl Landsteiner) को जाता है।

  • वर्ष: उन्होंने सन 1900 में यह पता लगाया कि इंसानों का खून पूरी तरह से एक जैसा नहीं होता, बल्कि इसमें आपस में भिन्नता होती है।

  • एबीओ (ABO) प्रणाली: कार्ल लैंडस्टीनर ने ही सबसे पहले A, B और O रक्त समूहों की खोज की थी। (इसके लिए उन्हें 1930 में चिकित्सा के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था)।

  • चौथा रक्त समूह (AB): 'AB' रक्त समूह की खोज 1902 में लैंडस्टीनर के दो शिष्यों— डीकास्टेलो (Decastello) और स्टुर्ली (Sturli) ने की थी।

रक्त समूहों कि खोज का मुख्य आधार (एंटीजन और एंटीबॉडी)

कार्ल लैंडस्टीनर ने यह खोज लाल रक्त कणिकाओं (RBC) की सतह पर पाए जाने वाले खास प्रोटीन (जिन्हें एंटीजन/Antigen कहा जाता है) और प्लाज्मा में मौजूद एंटीबॉडी (Antibody) के आधार पर की थी:

  1. एंटीजन A और B की उपस्थिति के आधार पर रक्त को चार मुख्य समूहों में बांटा गया: A, B, AB और O।

  2. सर्वदाता (Universal Donor): O-negative (या O ग्रुप) को सर्वदाता कहा जाता है क्योंकि इसके पास कोई एंटीजन नहीं होता, इसलिए यह किसी को भी खून दे सकता है।

  3. सर्वग्राही (Universal Recipient): AB-positive (या AB ग्रुप) को सर्वग्राही कहा जाता है क्योंकि इसके पास कोई एंटीबॉडी नहीं होती, इसलिए यह किसी भी समूह से खून ले सकता है।


रक्त समूह (Blood Group)आरबीसी पर एंटीजन (Antigen)प्लाज्मा में एंटीबॉडी (Antibody)किसको खून दे सकता है (Can Donate To)किससे खून ले सकता है (Can Receive From)
AAanti-BA, ABA, O
BBanti-AB, ABB, O
ABA और B दोनोंकोई नहीं (None)केवल ABसभी से (A, B, AB, O) — सर्वग्राही
Oकोई नहीं (None)anti-A और anti-B दोनोंसभी को (A, B, AB, O) — सर्वदाताकेवल O

रक्त समूह की जीनोटाइप (Genotype) और फेनोटाइप (Phenotype) की सारणी

नीचे दी गई तालिका से आप समझ सकते हैं कि किस आनुवंशिक जोड़े (Genotype) से कौन सा रक्त समूह (Phenotype) बनता है:

रक्त समूह (Phenotype)संभावित जीनोटाइप (Genotype)व्याख्या
A$I^A I^A$ या $I^A i$A एंटीजन मौजूद होता है
B$I^B I^B$ या $I^B i$B एंटीजन मौजूद होता है
AB$I^A I^B$दोनों एलील साथ होने के कारण सह-प्रभाविता
O$i i$कोई प्रभावी एलील न होने के कारण (एंटीजन अनुपस्थित)


आरएच कारक (Rh Factor)

1. परिचय एवं खोज (Introduction & Discovery)

  • खोजकर्ता: आरएच कारक की खोज सन 1940 में वैज्ञानिक कार्ल लैंडस्टीनर (Karl Landsteiner) और अलेक्जेंडर विनर (Alexander Wiener) ने की थी।

  • नामकरण: इसकी खोज सबसे पहले 'रीसस' (Rhesus) नामक बंदर की प्रजाति में की गई थी, इसीलिए इसके नाम का शुरुआती हिस्सा 'Rh' रखा गया।

  • यह क्या है: यह लाल रक्त कणिकाओं (RBC) की सतह पर पाया जाने वाला एक विशेष प्रकार का प्रोटीन (एंटीजन) होता है।

2. Rh फैक्टर के प्रकार (Types of Rh Factor)

व्यक्ति के खून में इस प्रोटीन की उपस्थिति के आधार पर रक्त समूह दो प्रकार के होते हैं:

  1. Rh-पॉजिटिव ($Rh^+$ / Rh धनात्मक):

    • यदि किसी व्यक्ति के RBC पर यह Rh एंटीजन मौजूद है, तो उसका रक्त समूह पॉजिटिव कहलाता है (जैसे $A^+$, $B^+$, $AB^+$, $O^+$)।

    • दुनिया में अधिकांश लोगों (लगभग 85%) का रक्त समूह Rh-पॉजिटिव होता है।

  2. Rh-नेगेटिव ($Rh^-$ / Rh ऋणात्मक):

    • यदि किसी व्यक्ति के RBC पर यह Rh एंटीजन अनुपस्थित है, तो उसका रक्त समूह नेगेटिव कहलाता है (जैसे $A^-$, $B^-$, $O^-$)।

        

Rh सिस्टम के मुख्य एंटीजन (D, C, c, E, e)

लाल रक्त कणिकाओं (RBC) की सतह पर केवल एक ही नहीं, बल्कि कई प्रकार के Rh प्रोटीन (एंटीजन) हो सकते हैं। इनमें से चिकित्सा विज्ञान में पाँच एंटीजन को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है, जिन्हें D, C, c, E और e कहा जाता है।

  1. D एंटीजन (सबसे महत्वपूर्ण):

    • यह Rh सिस्टम का सबसे प्रमुख और शक्तिशाली एंटीजन है।

    • यदि किसी व्यक्ति के खून में D एंटीजन मौजूद है, तो उसका रक्त समूह Rh-पॉजिटिव ($Rh^+$) कहलाता है।

    • यदि D एंटीजन अनुपस्थित है, तो रक्त समूह Rh-नेगेटिव ($Rh^-$) कहलाता है।

      (अस्पताल या लैब में ब्लड ग्रुप चेक करते समय मुख्य रूप से इसी D एंटीजन की जाँच की जाती है।)

  2. C, c, E और e एंटीजन:

    • ये D के अलावा अन्य सहायक एंटीजन हैं जो हर व्यक्ति के खून में अलग-अलग संयोजनों (Combinations) में पाए जाते हैं।

    • इनका उपयोग मुख्य रूप से रक्त आधान (Blood Transfusion) के दौरान, आनुवंशिक परीक्षण (Paternity/Genetics Testing), और जटिल मामलों में सटीक मिलान करने के लिए किया जाता है ताकि शरीर में कोई गंभीर रिएक्शन न हो।


3. रक्त आधान (Blood Transfusion) में महत्व

  • खून चढ़ाते समय (Blood Transfusion) यह देखना बहुत जरूरी होता है कि दाता (Donor) और ग्राही (Recipient) दोनों का Rh फैक्टर मेल खाता हो या नहीं।

  • यदि $Rh^-$ (नेगेटिव) रक्त वाले व्यक्ति को गलती से $Rh^+$ (पॉजिटिव) रक्त चढ़ा दिया जाए, तो पहली बार में तो शरीर इसके खिलाफ एंटीबॉडी बनाना शुरू करता है, लेकिन दूसरी बार ऐसा होने पर रक्त आपस में चिपक कर (Agglutination) गंभीर प्रतिक्रिया पैदा कर सकता है, जिससे मरीज की जान भी जा सकती है।


Rh फैक्टर के आधार पर रक्त आधान (Blood Transfusion) तालिका

रक्त समूह (Blood Group)किसको रक्त दे सकता है? (Can Donate To)किससे रक्त ले सकता है? (Can Receive From)
$O^-$ (O नेगेटिव)सभी को ($O^-$, $O^+$, $A^-$, $A^+$, $B^-$, $B^+$, $AB^-$, $AB^+$) — (यूनिवर्सल डोनर)केवल $O^-$
$O^+$ (O पॉजिटिव)$O^+$, $A^+$, $B^+$, $AB^+$$O^+$ और $O^-$
$A^-$ (A नेगेटिव)$A^-$, $A^+$, $AB^-$, $AB^+$$A^-$ और $O^-$
$A^+$ (A पॉजिटिव)$A^+$ और $AB^+$$A^+$, $A^-$, $O^+$, $O^-$
$B^-$ (B नेगेटिव)$B^-$, $B^+$, $AB^-$, $AB^+$$B^-$ और $O^-$
$B^+$ (B पॉजिटिव)$B^+$ और $AB^+$$B^+$, $B^-$, $O^+$, $O^-$
$AB^-$ (AB नेगेटिव)$AB^-$ और $AB^+$$AB^-$, $A^-$, $B^-$, $O^-$
$AB^+$ (AB पॉजिटिव)केवल $AB^+$सभी से ($O, A, B, AB$ के सभी पॉजिटिव और नेगेटिव) — (यूनिवर्सल रेसिपिएंट)
विवाह और रक्त समूह (Rh फैक्टर) की तालिका 

पति का रक्त समूह (Husband's Blood Group)पत्नी का रक्त समूह (Wife's Blood Group)चिकित्सीय स्थिति / प्रभाव (Medical Status)
कोई भी ($Rh^+$ या $Rh^-$)Rh-पॉजिटिव ($Rh^+$)पूर्णतः सुरक्षित (Normal): इसमें भविष्य में बच्चे के जन्म को लेकर कोई रक्त संबंधी जोखिम नहीं होता।
Rh-नेगेटिव ($Rh^-$)Rh-नेगेटिव ($Rh^-$)पूर्णतः सुरक्षित (Normal): माता और पिता दोनों नेगेटिव होने पर बच्चे का रक्त भी नेगेटिव होगा, जिससे कोई समस्या नहीं आती।
Rh-पॉजिटिव ($Rh^+$)Rh-नेगेटिव ($Rh^-$)सावधानी की आवश्यकता (Caution Needed): इसे Rh असंगति (Rh Incompatibility) कहते हैं। पहले बच्चे में आमतौर पर कोई दिक्कत नहीं होती, लेकिन दूसरे बच्चे के समय 'एरिथ्रोब्लास्टोसिस फिटलिस' (Erythroblastosis Fetalis) का जोखिम हो सकता है।

4. गर्भरक्ताणु कोरकता (Erythroblastosis Fetalis)

एरिथ्रोब्लास्टोसिस फिटलिस (Erythroblastosis Fetalis) एक गंभीर चिकित्सीय स्थिति है जो मुख्य रूप से माँ और गर्भ में पल रहे बच्चे के Rh फैक्टर (Rh Factor) में असंगति (Mismatch) के कारण उत्पन्न होती है।

इसे हेमोलिटिक डिजीज ऑफ द न्यूबॉर्न (Hemolytic Disease of the Newborn - HDN) भी कहा जाता है। इसका विस्तृत विवरण नीचे दिया गया है:

     यह स्थिति कैसे उत्पन्न होती है?


  • माता का ब्लड ग्रुप: यदि माता का रक्त Rh-नेगेटिव ($Rh^-$) है।

  • पिता का ब्लड ग्रुप: यदि पिता का रक्त Rh-पॉजिटिव ($Rh^+$) है।

  • संतान का ब्लड ग्रुप: ऐसी स्थिति में आनुवंशिक रूप से होने वाले बच्चे का रक्त Rh-पॉजिटिव ($Rh^+$) होने की संभावना होती है।

   प्रक्रिया और खतरा (How it Happens)


  1. पहला गर्भधारण: सामान्य तौर पर पहले बच्चे के जन्म के समय तक माँ और बच्चे का खून आपस में नहीं मिलता। लेकिन प्रसव (Delivery) के समय बच्चे के कुछ $Rh^+$ लाल रक्त कण (RBC) माँ के रक्त संपर्क में आ जाते हैं।

  2. एंटीबॉडी का बनना: चूंकि माँ का शरीर $Rh^-$ (नेगेटिव) है, वह इस बाहरी पॉजिटिव खून को बाहरी दुश्मन मानकर इसके खिलाफ अपने खून में Rh एंटीबॉडी (Antibodies) बनाना शुरू कर देता है। (पहला बच्चा आमतौर पर पूरी तरह स्वस्थ पैदा होता है)।

  3. दूसरा गर्भधारण (मुख्य समस्या): यदि महिला दोबारा गर्भवती होती है और दूसरा बच्चा भी $Rh^+$ (पॉजिटिव) होता है, तो माँ के शरीर में पहले से मौजूद एंटीबॉडीज प्लेसेंटा (Placenta) को पार करके गर्भ में पल रहे बच्चे के खून में पहुँच जाती हैं।

  4. रक्त कोशिकाओं का नष्ट होना: ये एंटीबॉडीज बच्चे की लाल रक्त कणिकाओं (RBC) को तेजी से नष्ट (Hemolysis) करने लगती हैं।

    इसके मुख्य लक्षण और प्रभाव


  • बच्चे में गंभीर एनीमिया (खून की भारी कमी) हो जाती है।

  • बच्चे को पीलिया (Jaundice) बहुत कम उम्र या जन्म के तुरंत बाद हो जाता है।

  • यकृत (Liver) और प्लीहा (Spleen) सूज जाते हैं।

  • गंभीर मामलों में बच्चे में अत्यधिक सूजन (Hydrops Fetalis) हो सकती है या गर्भ में ही बच्चे की जान खतरे में पड़ सकती है।

    बचाव और इलाज (Prevention & Treatment)


  • एंटी-डी इंजेक्शन (Anti-D Immunoglobulin): आधुनिक चिकित्सा में इस समस्या का पक्का समाधान है। $Rh^-$ (नेगेटिव) रक्त वाली माता को पहले बच्चे के जन्म के 72 घंटे के भीतर (या गर्भपात/मिश्रित जटिलताओं के समय) Anti-D इंजेक्शन / रोहगम नामक टीका दिया जाता है।

  • यह इंजेक्शन माँ के शरीर में Rh एंटीबॉडी बनने से रोक देता है, जिससे अगले बच्चे को कोई खतरा नहीं होता।