नर जनन तंत्र
(Male Reproductive System)
मुख्य अंग और उनकी संरचना
1. वृषण (Testes - एकवचन: Testis)
- स्थिति: ये नर के प्राथमिक जनन अंग हैं, जो उदर गुहा के बाहर एक थैलीनुमा संरचना में स्थित होते हैं, जिसे वृषण कोष (Scrotum) कहते हैं।
- महत्व: वृषण कोष का तापमान शरीर के सामान्य तापमान से लगभग $2^\circ\text{C}$ से $2.5^\circ\text{C}$ कम होता है, जो शुक्राणु निर्माण (शुक्राणु जनन) के लिए अनुकूल होता है।
नर जर्म कोशिकाएँ (Male Germ Cells / Spermatogonia)
कार्य: ये प्राथमिक कोशिकाएँ होती हैं जो सूत्री विभाजन (Mitosis) और अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) के माध्यम से लगातार विभाजित होकर अंततः शुक्राणुओं (Sperms) का निर्माण करती हैं।
सर्टोली कोशिकाएँ (Sertoli Cells / Nurse Cells)
कार्य:
ये विकासशील और परिपक्व हो रहे शुक्राणुओं को पोषण प्रदान करती हैं।
ये ब्लड-टेस्टिस बैरियर (Blood-Testis Barrier) का निर्माण करती हैं, जो रक्त में मौजूद हानिकारक पदार्थों या प्रतिरक्षा कोशिकाओं को शुक्राणुओं तक पहुँचने से रोकता है।
ये इन्ट्रिबिन (Inhibin) नामक हार्मोन का स्राव करती हैं जो फॉलिकल-स्टिम्युलेटिंग हार्मोन (FSH) के स्तर को नियंत्रित करता है।
लेडिग कोशिकाएँ (Leydig Cells / Interstitial Cells)
कार्य: ये शुक्रजनक नलिकाओं के ठीक बाहर खाली स्थान (अंतरालीय अवकाश) में पाई जाती हैं। इनका मुख्य कार्य एण्ड्रोजन (Androgens), विशेष रूप से टेस्टोस्टेरोन (Testosterone) नामक नर हार्मोन का संश्लेषण और स्राव करना है। यह हार्मोन शुक्राणु निर्माण (शुक्राणु जनन) को प्रेरित करता है और पुरुषों में द्वितीयक लैंगिक लक्षणों (जैसे दाढ़ी-मूंछ, आवाज़ का भारी होना आदि) के लिए उत्तरदायी है।
अन्य कोशिकाएँ -
प्रतिरक्षा कोशिकाएँ (Immune Cells / Macrophages)
कार्य: वृषण के ऊतकों में मैक्रोफेज भी मौजूद होते हैं जो किसी भी बाहरी संक्रमण या मृत कोशिकाओं को नष्ट करके प्रतिरक्षा सुरक्षा प्रदान करते हैं।
2. सहायक नलिकाएं (Accessory Ducts)
- वृषण जालिका (Rete Testis): शुक्रजनक नलिकाएं इसमें खुलती हैं।
- शुक्र वाहिकाएं (Vasa Efferentia): ये नलिकाएं शुक्राणुओं को वृषण से निकालकर अधिवृषण में पहुंचाती हैं।
- अधिवृषण (Epididymis): यह वृषण के पिछले भाग पर स्थित एक लंबी, कुंडलित नली है। यहाँ शुक्राणु कुछ समय के लिए संग्रहित रहते हैं और परिपक्व (Mature) होकर अपनी गतिशीलता प्राप्त करते हैं।
- शुक्र वाहिका (Vas Deferens): यह अधिवृषण से निकलकर ऊपर उदर गुहा में जाती है, मूत्राशय के ऊपर से घूमती है और स्खलन नली में खुलती है। यह शुक्राणुओं को आगे ले जाती है।
3. सहायक ग्रंथियाँ (Accessory Glands)
- शुक्राशय (Seminal Vesicles): यह एक जोड़ा ग्रंथि है जो फ्रुक्टोज शर्करा, प्रोस्टाग्लैंडीन और अन्य पदार्थयुक्त तरल स्रावित करती है। यह शुक्राणुओं को ऊर्जा और गतिशीलता प्रदान करता है। (यह कुल वीर्य का लगभग 60-70% भाग बनाता है)।
- प्रोस्टेट ग्रंथि (Prostate Gland): यह मूत्रमार्ग के चारों ओर स्थित होती है। इसका स्राव दुधिया और क्षारीय होता है, जो अम्लीय योनि मार्ग में शुक्राणुओं की रक्षा करता है।
- बल्बोयूरेथ्रल ग्रंथि / काउपर ग्रंथि (Bulbourethral Glands): यह एक जोड़ा छोटी ग्रंथियाँ हैं जिनका स्राव मूत्रमार्ग को चिकना (Lubrication) बनाता है और मैथुन के समय अमलता को उदासीन करता है।
4. बाह्य जनन अंग (External Genitalia)
- शिशन (Penis): यह एक पेशीय और स्पंजी ऊतकों से बना बेलनाकार अंग है जो वीर्य को मादा जनन मार्ग में स्थानांतरित करने का मुख्य माध्यम है। शिशन के अगले फूले हुए भाग को शिशन मुंड (Glans penis) कहते हैं, जो एक ढीली त्वचा (Foreskin) से ढका होता है। मूत्रमार्ग इसी से होकर गुजरता है, जिससे मूत्र और वीर्य दोनों बाहर आते हैं।
मादा जनन तंत्र
(Female Reproductive System)
मादा जनन तंत्र में वे सभी अंग शामिल होते हैं जो अंडे (अंडाणु) के उत्पादन, निषेचन, भ्रूण के विकास, और शिशु जन्म में सहायता करते हैं। इसे मुख्य रूप से निम्नलिखित भागों में बांटा गया है:
मुख्य अंग और उनकी संरचना
1. अंडाशय (Ovaries - एकवचन: Ovary)
स्थिति: ये मादा के प्राथमिक जनन अंग हैं जो उदर के निचले हिस्से में गर्भाशय के दोनों ओर एक-एक जोड़े के रूप में स्थित होते हैं।
ये मुख्य रूप से अण्डों का निर्माण करता है यौवनावस्था (puberty) के समय 11 से 13 वर्ष की आयु में अंडाशय सक्रिय हो जाता है |
अंडाशय से निम्न हॉर्मोन स्रावित होते है - ऐस्टोजन (Estrogen) : यह हारमोन अण्डाशय की ग्रैफियन पुटिकाओं (Graafian follicles) की थीका इन्टरना (theca interna) से निकलता है। ऐस्ट्रोजन में ऐस्टेडिओल (estradiol), ऐस्ट्रोन (estrone) तथा ऐस्ट्रिओल (estriol) होते हैं। यह हॉर्मोन फॉलिकुलर गुहा में भरा रहता है तथा परिपक्व अण्डविसर्जन (ovulation) के साथ देह-गुहा में पहुँचता है।
ऐस्ट्रोजन के कार्य : यह निम्नलिखित कार्य करता है :(1) यौवनावस्था आरम्भ होने पर गर्भाशय (uterus), योनि (vagina), भगशिश्न (clitoris), व स्तनों के विकास को प्रेरित करता है।(2) वसा संचय के कारण नितम्ब भाग अधिक भारी व चौड़ा हो जाता है।(3) आवाज में मधुरता, चेहरे पर स्निग्धता, स्वभाव में शालीनता आ जाती है तथा रजोधर्म (menstrual cycle) प्रारम्भहोता है।(4) गर्भाशय की दीवार मोटी होकर निषेचित अंडे को ग्रहण करने के लिए तैयार हो जाती है।(5) यह गौण लैंगिक गुणों (secondary sexual characters) पर प्रभाव डाल कर नारी विकास को प्रभावित करता है इसीलिए इसे नारी-विकास हॉर्मोन (feminizing hormone) कहते हैं।6) इस हॉर्मोन की कमी से जनन क्षमता कम हो जाती है, उदर भाग में पीड़ा होने लगती है रजोनिवृत्ति (menopause) का आभास होने लगता है तथा स्तन ढलने लगते हैं।ऐस्ट्रोजन के स्रावण का नियन्त्रण : ऐस्ट्रोजन हॉर्मोन का स्रावण पिट्यूटरी ग्रन्थि के दो हॉर्मोन्स, FSH तथा LH, द्वारा होता है।2. प्रोजेस्ट्रॉन हॉर्मोन (Progesterone hormone) : अण्डाशय में अण्डविसर्जन (ovulation) के बाद मैफियन पुटिका (Graffian follicles) की थीका इन्टरना बदल कर पीली ग्रन्थि या पिण्ड बनाती हैं जिसे कॉर्पस ल्यूटियम (corpus luteum) कहते हैं। कार्पस ल्यूटियम का निर्माण रजोधर्म (menstrual cycle) के आरम्भ होने से लगभग 14 दिन बाद होता है तथा पिट्यूटरी के LH हॉर्मोन से नियन्त्रित होता है।प्रोजेस्ट्रॉन के कार्य : प्रोजेस्ट्रॉन हॉर्मोन गर्भधारण (pregnancy) से सम्बन्धित लक्षणों के विकास को प्रभावित करता है।(1) गर्भाशय की दीवार में रुधिर पारिवहन बढ़ जाता है। इसकी कोशिकाओं में ग्लाइकोजन तथा वसाओं का संचय हो जाता है।(2) स्तन अधिक विकसित हो जाते हैं, दुग्ध ग्रन्थियाँ सक्रिय होकर बड़ी हो जाती हैं।(3) निषेचन (fertilization) हो जाने पर कार्पस ल्यूटियम बना रहता है, नयी ग्रैफियन पुटिकाओं का निर्माण रुक जाता है तथा रजोधर्म बन्द हो जाता है। यदि निषेचन नहीं होता तो कार्पस ल्यूटियम नष्ट हो जाता है। पहले रजोधर्म के 26-28 दिन बाद अगला रजोधर्म प्रारम्भ हो जाता है तथा गर्भाशय पुनः सामान्य दशा में आ जाता है।(4) गर्भधारण के समय होने वाले परिवर्तनों का नियन्त्रण करने के कारण प्रोजेस्ट्रॉन या प्रोजेस्टीन (progesteron or progestin) को गर्भनिर्धारण हॉर्मोन (pregnancy hormone) कहते हैं।प्रोजेस्ट्रॉन के स्रावण का नियंत्रण : प्रोजेस्ट्रॉन हॉर्मोन का स्रावण पिट्यूटरी ग्रन्थि के LH हॉर्मोन द्वारा नियन्त्रित होता है।3. रिलैक्सिन (Relaxin) : अण्डाशय में बना कार्पस ल्यूटियम रिलैक्सिन हॉर्मोन्स का स्रावण गर्भावस्था की समाप्ति पर बच्चे के जन्म के समय करता है। यह हॉर्मोन प्यूबिक संधान (pubic symphysis) नामक जोड़ तथा इस प्रदेश की पेशियों को लचीला बनाता है जिससे जनन-नाल (birth canal) चौड़ी हो जाती है। इससे बच्चे के जन्म में सहायता मिलती है।ऊफॉरेक्टॉमी (Oophorectomy) : इस प्रकिया में ऑप्रेशन द्वारा अंडाशयों (ovaries) को काट कर निकाल दिया जाता है। इससे गौण लैंगिक लक्षण (secondary sex characters) तथा सहायक लिंग अंग (accessory sex organs) का विकास रुक जाता है।
2. अंडवाहिनी / फैलोपियन ट्यूब (Fallopian Tubes / Oviducts)
प्रत्येक अंडाशय के पास एक कीप के आकार की संरचना (कीपिका/Infundibulum) होती है जो अंडवाहिनी में खुलती है।
महत्व: यह अंडाशय से निकले अंडे को गर्भाशय तक पहुँचाती है। यहीं पर नर युग्मक (शुक्राणु) और मादा युग्मक (अंडाणु) का मिलन होता है, जिसे निषेचन (Fertilization) कहते हैं।
3. गर्भाशय (Uterus / Womb)
यह एक नाशपाती के आकार की पेशीय थैलीनुमा संरचना है जो मूत्राशय के ऊपर और पीछे स्थित होती है।
महत्व: गर्भाशय की दीवार तीन परतों (बाहरी पैरीमेट्रियम, मध्य मायोमेट्रियम और भीतरी एंडोमेट्रियम) से बनी होती है। निषेचित अंडे का रोपण (Implantation) इसी एंडोमेट्रियम में होता है, जहाँ नौ महीने तक भ्रूण का विकास होता है।
4. योनि (Vagina)
यह एक पेशीय और नलीनुमा संरचना है जो गर्भाशय ग्रीवा (Cervix) से बाहर की ओर खुलती है। यह मैथुन के दौरान वीर्य ग्रहण करने का मार्ग, मासिक धर्म के रक्तस्राव का मार्ग, और शिशु जन्म के समय जन्म नाल (Birth canal) के रूप में कार्य करती है।
