Cosmology कोस्मोलॉजी - ब्रह्माण्ड का अध्ययन
- अंतरिक्ष यात्री / एस्ट्रोनॉट (Astronaut): यह शब्द मुख्य रूप से अमेरिका, कनाडा, यूरोप और जापान के अंतरिक्ष यात्रियों के लिए उपयोग किया जाता है। (यह ग्रीक शब्द Astra यानी तारा और Nautes यानी नाविक से बना है।)
- कॉस्मोनॉट (Cosmonaut): रूस (या पूर्व सोवियत संघ) के अंतरिक्ष यात्रियों को कॉस्मोनॉट कहा जाता है। (यह रूसी शब्द Kosmos यानी ब्रह्मांड और Nautes से मिलकर बना है।)
- ताइकोनॉट (Taikonaut): चीन के अंतरिक्ष यात्रियों को ताइकोनॉट कहा जाता है। (यह चीनी शब्द Taikong यानी अंतरिक्ष और ग्रीक शब्द Nautes का मिश्रण है।)
- व्योमोनॉट (Vyomonaut) / अंतरिक्ष यात्री: भारत के अंतरिक्ष यात्रियों के लिए पारंपरिक रूप से 'अंतरिक्ष यात्री' शब्द का प्रयोग होता है, हालांकि संस्कृत मूल के आधार पर इन्हें 'व्योमोनॉट' या 'गगननॉट्स' (Gagannauts - गगनयान मिशन के संदर्भ में) भी कहा जाने लगा है।
कक्षीय चाल ज्ञात करने का सूत्र और तरीका:
- पृथ्वी का द्रव्यमान = $M$
- पृथ्वी की त्रिज्या = $R$
- उपग्रह की पृथ्वी की सतह से ऊँचाई = $h$
- उपग्रह की कक्षा की कुल त्रिज्या ($r$) = $R + h$
- उपग्रह का द्रव्यमान = $m$
- सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण स्थिरांक = $G$
पृथ्वी की सतह के पास स्थित उपग्रह के लिए:
- मान गणना: पृथ्वी के लिए $g \approx 9.8 \, \text{m/s}^2$ और $R \approx 6400 \, \text{km}$ रखने पर कक्षीय चाल लगभग $7.9 \, \text{km/s}$ (या लगभग 28,400 किमी/घंटा) आती है।
- 1. कक्षीय वेग (Orbital Velocity):
- वेग: लगभग 7.9 किलोमीटर प्रति सेकंड (लगभग 28,400 किमी/घंटा)।
- उपयोग: जब किसी उपग्रह को पृथ्वी की कक्षा (Orbit) में स्थापित करना होता है, ताकि वह पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगा सके, तब उसे इस वेग से प्रक्षेपित किया जाता है।
- 2. पलायन वेग (Escape Velocity):
- वेग: लगभग 11.2 किलोमीटर प्रति सेकंड (लगभग 40,320 किमी/घंटा)।
- उपयोग: यदि किसी अंतरिक्ष यान या प्रोब को पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र को पूरी तरह पार करके अंतरिक्ष में दूर (जैसे चंद्रमा, मंगल ग्रह या अन्य अंतरिक्ष अभियानों के लिए) भेजना होता है, तो उसे इस न्यूनतम वेग की आवश्यकता होती है।
अंतरिक्ष विज्ञान का इतिहास
- 4 अक्टूबर 1957: दुनिया का पहला कृत्रिम उपग्रह 'स्पुतनिक-1' (Sputnik-1) सोवियत संघ (USSR) द्वारा कजाकिस्तान के बैकोनूर कॉस्मोड्रोम से लॉन्च किया गया था।
- 3 नवंबर 1957: सोवियत संघ (रूस) द्वारा 'स्पुतनिक-2' भेजा गया, जिसमें पहली बार अंतरिक्ष में किसी जीव (लाइका नाम की कुतिया) को भेजा गया।
- 18 दिसंबर 1958: अमेरिका द्वारा पहला संचार उपग्रह 'स्कोर' (SCORE) लॉन्च किया गया था।
- 4 अक्टूबर 1959: सोवियत संघ का 'लूना-3' अंतरिक्ष यान भेजा गया, जिसने चंद्रमा के उस छुपे हुए हिस्से की पहली बार तस्वीरें लीं जिसे पृथ्वी से कभी नहीं देखा जा सकता (चंद्रमा का लगभग 59% हिस्सा कुल मिलाकर देखा जा सकता है और 41% हिस्सा स्थायी रूप से ओझल रहता है)।
- 12 अप्रैल 1961: रूस के 'वोस्टोक-1' यान से यूरी गगारिन अंतरिक्ष में जाने वाले पहले मानव बने।
- 16 जून 1963: रूस के 'वोस्टोक-6' यान से वैलेंटाइना तेरेश्कोवा अंतरिक्ष में जाने वाली पहली महिला बनीं।
- 16 नवंबर 1965: शुक्र (Venus) ग्रह के अध्ययन के लिए सोवियत संघ द्वारा 'वेनेरा-3' (Venera 3) लॉन्च किया गया था (यह शुक्र की सतह पर पहुँचने वाला पहला मानव निर्मित यान बना)।
- 3 फरवरी 1966: रूस के 'लूना-9' ने चंद्रमा की सतह पर पहली सफल सॉफ्ट लैंडिंग की और पहली बार सतह से तस्वीरें भेजीं।
- 15 अगस्त 1969: भारत में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की स्थापना हुई, जिसका मुख्यालय बेंगलुरु में है।
(वर्तमान अध्यक्ष: डॉ. वी. नारायणन उन्होंने 14 जनवरी 2025 को पूर्व अध्यक्ष एस. सोमनाथ का पदभार संभाला था।)
- 21 जुलाई 1969: अमेरिका के 'अपोलो-11' मिशन के तहत नील आर्मस्ट्रांग और एडविन एल्ड्रिन ने चंद्रमा पर पहला कदम रखा।
- 18 मई 1974: भारत का पहला परमाणु परीक्षण 'स्माइलिंग बुद्धा' (Smiling Buddha) पोखरण, फलोदी में किया गया था।
2. भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआत (Indian Space Programme)
1962: विक्रम अंबालाल साराभाई (अंतरिक्ष विज्ञान के जनक) की अध्यक्षता में 'इनकोसपार्क' (INCOSPAR) समिति का गठन हुआ।
21 नवंबर 1963
को इसी नाईके-अपाचे रॉकेट को केरल के तिरुवनंतपुरम के पास थुंबा इक्वेटोरियल रॉकेट लॉन्चिंग स्टेशन (TERLS) से सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया था। यह भारत की धरती से लॉन्च किया जाने वाला पहला रॉकेट था, यहीं से भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम (ISRO के शुरुआती दौर) की ऐतिहासिक शुरुआत हुई थी।
1972: अंतरिक्ष विभाग और अंतरिक्ष आयोग का गठन (नीति निर्माण और उन्हें लागू करने के लिए)।
19 अप्रैल 1975 : भारत का पहला उपग्रह 'आर्यभट्ट' रूस के 'इंटरकोसमोस' यान की सहायता से लॉन्च किया गया (यह भारत की धरती से नहीं छोड़ा गया था)।
1980: भारत ने अपने स्वदेशी प्रक्षेपण यान 'SLV-3' से रोहिणी श्रृंखला के उपग्रहों (RS-01 और RSD-2) को अपनी धरती से सफलतापूर्वक लॉन्च किया।
1981: भारत का पहला प्रायोगिक संचार उपग्रह 'एप्पल' (APPLE) फ्रेंच गुयाना (कोरू केंद्र) से एरियन-1 यान द्वारा छोड़ा गया। साथ ही भास्कर-द्वितीय लॉन्च किया गया।
1984: राकेश शर्मा 'सोयुज टी-1' यान से अंतरिक्ष में जाने वाले पहले भारतीय बने (महिला अंतरिक्ष यात्री: कल्पना चावला)।
3. प्रमुख अंतरिक्ष मिशन और अनुसंधान (Major Space Missions)
चंद्रयान-1 (22 अक्टूबर 2008): पीएसएलवी-सी11 द्वारा भेजा गया; चंद्रमा पर बर्फ और पानी का पता लगाने के लिए।
मंगल मिशन / MOM (5 नवंबर 2013): पीएसएलवी-सी25 द्वारा भेजा गया सबसे सस्ता मंगल मिशन। इसके साथ 5 उपकरण (MCC, MSM, Lyman Alpha Photometer, TIS, Menaka) भेजे गए थे। भारत पहले ही प्रयास में मंगल पर पहुँचने वाला दुनिया का पहला देश बना |
स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन (2014): ईंधन (प्रणोदक) के रूप में लिक्विड हाइड्रोजन (-253°C) और लिक्विड ऑक्सीजन का उपयोग। (इसरो प्रणोदक प्रणाली का मुख्यालय: महेंद्रगिरी, तमिलनाडु)।
एस्ट्रोसेट (2015): पृथ्वी से 650 किमी की ऊंचाई पर स्थापित भारत की पहली अंतरिक्ष वेधशाला।
वाणिज्यिक इकाइयां: पहली यूनिट 'एंट्रिक्स' और दूसरी (2019 में स्थापित) 'एनएसआईएल' (New Space India Limited)।
चंद्रयान-2 (2019): इसके तीन मुख्य भाग थे—ऑर्बिटर, लैंडर (विक्रम) और रोवर (प्रज्ञान)। दक्षिणी ध्रुव के पास उतरने के दौरान संपर्क टूटने के कारण यह आंशिक सफल रहा। रोवर प्रज्ञान में 6 पहिए हैं।
चंद्रयान-3 (14 जुलाई 2023): LVM3 (बाहुबली) यान द्वारा भेजा गया। इसके तहत 'चैस्टे', 'सेम्प' और 'रमभा' पेलोड भेजे गए। 23 अगस्त 2023 को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरने वाला भारत दुनिया का पहला देश बना।
4. नेविगेशन सिस्टम (Navigation Systems)
वैश्विक और अन्य देश:
भारत (India): NavIC (Navigation with Indian Constellation / IRNSS)
रूस (Russia): GLONASS
यूरोपीय संघ (European Union): Galileo
चीन (China): BeiDou
GPS (Global Positioning System) जिसे मूल रूप से NAVSTAR GPS (Navigation System with Time and Ranging) कहा जाता है—एक उपग्रह-आधारित नेविगेशन प्रणाली है। इसे संयुक्त राज्य अमेरिका के रक्षा विभाग (U.S. Department of Defense) द्वारा विकसित किया गया था।
Navic (भारत): मूल नाम IRNSS (इंडियन रीजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम)। मछुआरों और क्षेत्रीय उपयोग के लिए समर्पित। इस श्रृंखला में कुल 9 उपग्रह छोड़े गए (वर्तमान में 8 सक्रिय हैं, 8वें नंबर का '1H' असफल हो गया था)।
गगन (GAGAN): भारतीय हवाई मार्गों और विमानों के पथ प्रदर्शन (Air Navigation) के लिए इसरो और एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया की संयुक्त पहल (स्थापना: 2015)।
5. विशेष मिशन (Gaganyaan, NISAR, Aditya-L1)
गगनयान: भारत का पहला मानव अंतरिक्ष मिशन (3 अंतरिक्ष यात्रियों को 400 किमी की ऊंचाई पर भेजने की योजना)। इसके परीक्षण के लिए 'व्यामित्र' रोबोट बनाया गया।
निसार (NISAR): पर्यावरण और भूकंपीय बदलावों के अध्ययन के लिए NASA और ISRO का संयुक्त मिशन।
आदित्य-L1 (2 सितंबर 2023): सूर्य के कोरोना/किरट के अध्ययन के लिए पीएसएलवी-सी57 द्वारा लैंगरेज पॉइंट L1 (पृथ्वी से 1.5 मिलियन किमी दूर) पर भेजा गया भारत का पहला सौर मिशन।
6. अंतरिक्ष स्टेशन (Space Stations)
सैल्यूट (Salyut): रूस का अंतरिक्ष स्टेशन (क्षमता: 3 व्यक्ति)।
स्काईलैब: अमेरिका का अंतरिक्ष स्टेशन (क्षमता: 3 व्यक्ति)।
ISS (इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन): अमेरिका और रूस का संयुक्त स्टेशन (क्षमता: 6 व्यक्ति)।
तियागोंग (Tiangong): चीन का अंतरिक्ष स्टेशन।
(नोट: पृथ्वी से लगभग 400 किमी की ऊंचाई पर अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित होते हैं)।
7. उपग्रहों के प्रकार और कक्षाएं (Satellite Types & Orbits)
भू-स्थैतिक उपग्रह (Geostationary):
ऊंचाई: 36,000 किमी | परिक्रमण काल: 24 घंटे (दिशा: पश्चिम से पूर्व)।
उपयोग: मौसम, दूरदर्शन और संचार के लिए (जैसे INSAT श्रृंखला, मैटसेट, एडूसेट, GSAT-7 'रुक्मणी', GSAT-6, GSAT-19)। प्रक्षेपण: GSALV द्वारा।
सुदूर संवेदी उपग्रह (Remote Sensing):
ऊंचाई: 500 से 900 किमी | परिक्रमण काल: 84-90 मिनट (दिशा: पूर्व से पश्चिम)।
उपयोग: मैपिंग, जलवाष्प (मेघाट्रॉपिक्स), रिमोट सेंसिंग और प्राकृतिक संसाधनों के लिए (जैसे IRS, Cartosat, Risat)। प्रक्षेपण: PSLV द्वारा।
पृथ्वी की कक्षाएं (Orbits):
NEO (नियर अर्थ ऑर्बिटल - प्रायोगिक उपग्रह)
LEO (लोअर अर्थ ऑर्बिटल - 400-500 किमी)
MEO (मिडिल अर्थ ऑर्बिटल - 20,200 किमी - नेविगेशन उपग्रह)
HEO (हायर अर्थ ऑर्बिटल - 36,000 किमी - भू-स्थैतिक उपग्रह)
8. प्रमुख अंतरिक्ष केंद्र और अनुसंधान संस्थान (Space Centers)
इसरो मुख्यालय / एंट्रिक्स / डेटा कलेक्टिंग केंद्र / टेलीमेट्री: बेंगलुरु
विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर (VSSC): तिरुवनंतपुरम (यहाँ रॉकेट की डिज़ाइन बनती है)
सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र: श्रीहरिकोटा (आंध्र प्रदेश)
मास्टर कंट्रोल फैसिलिटी (MCF): हसन (कर्नाटक) और भोपाल (मध्य प्रदेश)
भारतीय डीप स्पेस नेटवर्क: ब्यालालू
इसरो प्रणोदक प्रणाली केंद्र: महेंद्रगिरी (तमिलनाडु)
राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र: हैदराबाद | भारतीय सुदूर संवेदन संस्थान: देहरादून
सेमीकंडक्टर अनुसंधान केंद्र: चंडीगढ़
भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला: अहमदाबाद
सौर अनुसंधान केंद्र: जयपुर | सैन्य सुदूर संवेदन केंद्र: जोधपुर
इसरो के रॉकेटों (प्रक्षेपण यान) को मुख्य रूप से इन प्रकारों में बांटा जा सकता है:
1. साउंडिंग रॉकेट (Sounding Rockets)
परिचय: यह छोटे, एक या दो चरणों वाले अनुसंधान रॉकेट होते हैं, जिनका उपयोग अंतरिक्ष में भेजने से पहले वायुमंडल (Atmosphere) की ऊपरी परतों का अध्ययन करने के लिए किया जाता है।
उदाहरण: नाईके-अपाचे (जिसके बारे में हमने पहले बात की थी) और भारत का स्वदेशी रोहिणी (Rohini) सीरीज के रॉकेट।
2. उपग्रह प्रक्षेपण यान - 3 (SLV-3 - Satellite Launch Vehicle)
परिचय: यह भारत का पहला प्रायोगिक उपग्रह प्रक्षेपण यान था, जो पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक पर आधारित था।
विशेषता: यह 4 चरणों वाला ठोस ईंधन वाला रॉकेट था। इसके जरिए 1980 में 'रोहिणी' उपग्रह को सफलताપૂર્વक कक्षा में स्थापित किया गया था।
3. संवर्धित उपग्रह प्रक्षेपण यान (ASLV - Augmented Satellite Launch Vehicle)
परिचय: यह SLV-3 का ही उन्नत (Advanced) रूप था। इसे अधिक वजन उठाने और भविष्य के रॉकेटों के लिए तकनीक विकसित करने के उद्देश्य से बनाया गया था।
4. ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (PSLV - Polar Satellite Launch Vehicle)
परिचय: यह इसरो का सबसे भरोसेमंद और सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला रॉकेट है, जिसे अंतरिक्ष की दुनिया में भारत का 'वर्कहॉर्स' कहा जाता है।
उपयोग: इसका मुख्य काम रिमोट सेंसिंग, मौसम, और पृथ्वी अवलोकन (Earth Observation) उपग्रहों को ध्रुवीय कक्षाओं में पहुँचाना है। (चंद्रयान-1 और मंगलयान भी इसी से गए थे)।
5. भू-स्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान (GSLV - Geosynchronous Satellite Launch Vehicle)
परिचय: यह PSLV से अधिक शक्तिशाली रॉकेट है, जिसमें क्रायोजेनिक इंजन का उपयोग किया जाता है।
उपयोग: इसका उपयोग भारी संचार उपग्रहों (Communication Satellites) को अंतरिक्ष की बहुत ऊँची भू-स्थिर कक्षा (लगभग 36,000 किमी) में भेजने के लिए किया जाता है।
6. लॉन्च व्हीकल मार्क-3 (LVM3 / GSLV Mk-III)
परिचय: यह इसरो का सबसे भारी और सबसे शक्तिशाली वर्तमान रॉकेट है। (इसे पहले GSLV Mk-III कहा जाता था)।
उपयोग: इसी शक्तिशाली रॉकेट से चंद्रयान-3 को चंद्रमा पर भेजा गया था। इसके अलावा, भारत के आगामी मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन (गगनयान) के लिए भी इसी रॉकेट का उपयोग किया जा रहा है।
भविष्य की तकनीक (Reusable Launch Vehicle - RLV)
इन सबके अलावा, इसरो भविष्य की लागत को कम करने के लिए पुनर्चक्रणीय प्रक्षेपण यान (Reusable Launch Vehicle) यानी 'रीयूजेबल रॉकेट' की तकनीक पर भी तेजी से काम कर रहा है, जो विमान की तरह उड़ान भरकर वापस ज़मीन पर उतर सकता है।
